Ghatotkach (Source. Pinterest)
Mahabharat Mystery About Ghatotkach: महाभारत की कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी हजारों वर्ष पहले थी। यह महाकाव्य केवल कौरवों और पांडवों का युद्ध नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के संघर्ष की अमर गाथा है। इस कथा में कई ऐसे पात्र हैं, जिनका जीवन और अंत गहरे रहस्यों से भरा हुआ है। उन्हीं में से एक थे घटोत्कच, जिनकी वीरता जितनी प्रसिद्ध है, उतनी ही रहस्यमयी उनकी मृत्यु भी।
घटोत्कच पांडु पुत्र भीम और राक्षसी हिडिम्बा के पुत्र थे। वे अलौकिक शक्तियों से संपन्न, पराक्रमी और युद्ध में अद्भुत योद्धा थे। महाभारत युद्ध के दौरान उन्होंने अकेले ही कौरवों की विशाल सेना को भारी क्षति पहुंचाई थी। उनकी माया और शक्ति से कौरव सेना भयभीत हो उठी थी।
महाभारत की कथा के अनुसार, जब घटोत्कच पहली बार पांडवों के महल में पहुंचे, तो उन्होंने अपनी माता हिडिम्बा की आज्ञा का पालन करते हुए सभी पांडवों को प्रणाम किया, लेकिन द्रौपदी को सम्मान देना भूल गए। उन्होंने द्रौपदी को एक साधारण नारी समझकर उनकी उपेक्षा कर दी। यही उनकी सबसे बड़ी भूल बन गई।
स्कंद पुराण के प्रभास खंड के अनुसार, द्रौपदी पांचाल नरेश की पुत्री और पांडवों की पत्नी थीं। घटोत्कच के इस व्यवहार से वे अत्यंत आहत हो गईं। उन्हें लगा कि राक्षसी कुल में जन्मा यह योद्धा राजमर्यादा और स्त्री सम्मान का महत्व नहीं समझता।
अपमान से क्रोधित होकर द्रौपदी ने घटोत्कच को श्राप देते हुए कहा, “तुमने एक महारानी का अपमान किया है, इसलिए तुम्हारी आयु कम होगी और तुम युद्ध के अंत से पहले अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।” जब यह बात भीम को पता चली, तो उन्होंने द्रौपदी से क्षमा मांगी। द्रौपदी का क्रोध तो शांत हुआ, लेकिन दिया गया श्राप वापस नहीं लिया जा सका।
महाभारत युद्ध में जब घटोत्कच ने कौरव सेना को तहस-नहस कर दिया, तब दुर्योधन के कहने पर कर्ण ने देवराज इंद्र से प्राप्त ‘अमोघ शक्ति’ अस्त्र का प्रयोग किया। इस अस्त्र से घटोत्कच का वध हो गया। कहा जाता है कि यह सब श्रीकृष्ण की लीला थी, क्योंकि अर्जुन के प्राण बचाने और धर्म की स्थापना के लिए कर्ण का यह अस्त्र घटोत्कच पर चलना आवश्यक था।
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घटोत्कच की कथा यह सिखाती है कि सम्मान और मर्यादा का उल्लंघन, चाहे अनजाने में ही क्यों न हो, भारी परिणाम ला सकता है। उनकी मृत्यु वीरता से भरी थी, लेकिन एक छोटी-सी भूल ने उनके भाग्य की दिशा बदल दी।