दानवीर कर्ण को क्यों झेलना पड़ा अपमान और दर्द? जानिए पूर्वजन्म का राक्षस होने का रहस्य
Karna Previous Birth: महाभारत केवल एक युद्धग्रंथ नहीं, बल्कि कर्म, शाप और मोक्ष की गूढ़ कहानियों का अद्भुत संगम है। इस महाकाव्य के लगभग हर योद्धा की जीवन-गाथा किसी न किसी पूर्वजन्म से जुड़ी हुई है।
- Written By: सिमरन सिंह
Karna (Source. Pinterest)
Mahabharata Karna Mystery: महाभारत केवल एक युद्धग्रंथ नहीं, बल्कि कर्म, शाप और मोक्ष की गूढ़ कहानियों का अद्भुत संगम है। इस महाकाव्य के लगभग हर योद्धा की जीवन-गाथा किसी न किसी पूर्वजन्म से जुड़ी हुई है। इन्हीं में सबसे मार्मिक और रहस्यमयी कथा है महाभारत के महान योद्धा कर्ण की। वीरता, साहस और दानशीलता की मिसाल होने के बावजूद कर्ण को जीवनभर अपमान और पीड़ा झेलनी पड़ी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसका कारण उनके पूर्वजन्म का शाप था।
पूर्वजन्म में कर्ण थे दंभोद्भवा नामक असुर
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कर्ण ने अपने पूर्वजन्म में दंभोद्भवा नामक असुर के रूप में जन्म लिया था। सूर्यदेव ने दंभोद्भवा को 100 कुंडल-कवच प्रदान किए थे और वरदान दिया था कि जो भी इन कवचों को तोड़ेगा, उसकी मृत्यु हो जाएगी। साथ ही यह भी तय था कि एक हजार वर्ष की तपस्या से केवल एक ही कवच तोड़ा जा सकता है। इसी वरदान के कारण दंभोद्भवा अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी बन गया तथा लोगों पर अत्याचार करने लगा।
नर-नारायण से हुआ भयंकर युद्ध
दंभोद्भवा के आतंक से त्रस्त होकर देवताओं और मनुष्यों ने नर-नारायण ऋषियों की शरण ली, जो आगे चलकर श्रीकृष्ण और अर्जुन के अंशावतार माने गए। दंभोद्भवा को यह भी वरदान था कि उसकी मृत्यु उसी के हाथों होगी जिसने हजार वर्षों तक तपस्या की हो। नर-नारायण वर्षों से तपस्या में लीन थे। युद्ध में नर एक कवच तोड़ते और मारे जाते, फिर नारायण उन्हें जीवित कर देते। इसके बाद नारायण युद्ध करते और वही क्रम दोहराया जाता।
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99 कवच टूटे, लेकिन बच गया असुर
इस प्रकार लगातार युद्ध करते हुए दंभोद्भवा के 99 कवच टूट गए। भयभीत होकर वह सूर्यदेव की शरण में चला गया। सूर्यदेव ने अपने दिए हुए वरदान के कारण दंभोद्भवा को अपने पीछे छुपा लिया। तब नर-नारायण ने सूर्यदेव से कहा कि “अगले जन्म में यह आपके तेज से आपके पुत्र के रूप में जन्म लेगा, लेकिन कवच होने के बावजूद मारा जाएगा। हम भी उसे मारने के लिए फिर जन्म लेंगे।”
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कर्ण के रूप में जन्म और अर्जुन के हाथों मृत्यु
इसी शाप के फलस्वरूप दंभोद्भवा का जन्म कर्ण के रूप में हुआ। इस जन्म में भी कर्ण कुंडल-कवच के साथ पैदा हुए। वहीं नर-नारायण ने द्वापर युग में अर्जुन और श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। श्रीकृष्ण कर्ण के अंत को जानते थे, इसलिए उन्होंने इंद्रदेव को ऋषि का वेश देकर कर्ण से दान में कुंडल-कवच मंगवाया। दान के बाद कर्ण की शक्ति क्षीण हो गई और कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथों उनका अंत हुआ। इसी के साथ कर्ण का पूर्वजन्म का शाप भी पूर्ण हुआ।
