

महिषासुर का अजेय वरदान और देवलोक पर कब्जा
त्रिदेवों व देवताओं के महातेज से मां दुर्गा का प्राकट्य
देवताओं द्वारा मां को दिव्य अस्त्र-शस्त्र अर्पण
मां दुर्गा की गगनभेदी गर्जना और महिषासुर की घबराहट
नौ दिनों का भीषण युद्ध और महिषासुरमर्दिनी का अवतार
Durga Prakatya Katha Mahisasur Vadh: हमारी धार्मिक मान्यताओं और कथाओं में दुर्गा देवी के प्रकट होने की कथा को सनातन धर्म की सबसे दिव्य, ओजस्वी और प्रेरणादायी कथाओं में से एक माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मां आदिशक्ति का यह अवरतण ब्रह्मांड से अधर्म, अत्याचार और अंधकार के नाश का प्रतीक है। मार्कंडेय पुराण के 'देवी महात्म्य' अर्थात् दुर्गा सप्तशती में इस पावन कथा का अत्यंत विस्तृत और भव्य वर्णन मिलता है।
कहा जाता है कि यह पावन वृत्तांत न केवल मां दुर्गा के प्रकट होने और उनके अलौकिक स्वरूप का वर्णन करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि जब-जब संसार में पाप और अधर्म का प्रभाव बढ़ता है, तब-तब परमशक्ति दुष्टों के संहार के लिए अवश्य प्रकट होती है।
सत्ययुग की इस कथा के केंद्र में महिषासुर नाम का एक अत्यंत पराक्रमी और महत्वाकांक्षी असुर था। वह रंभ नाम के असुर का पुत्र था, जिसने महिष अथवा भैंसे के रूप वाली एक आसुरी से जन्म लिया था, इसी कारण उसका नाम महिषासुर पड़ा। महिषासुर ने अमर होने की इच्छा से भगवान ब्रह्मा की सदियों तक अत्यंत कठिन तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो महिषासुर ने अमरता का वरदान मांगा।
ब्रह्मा जी ने कहा, "हे महिषासुर! इस संसार में जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए अमरता के अलावा कोई अन्य वरदान मांगो।" महिषासुर ने बड़ी चतुराई से सोचा कि एक स्त्री स्वभाव से अत्यंत कोमल और कमजोर होती है, वह भला मेरा वध कैसे कर सकती है? इसलिए उसने वरदान मांगा कि संसार का कोई भी देवता, दानव, मानव, यक्ष, गंधर्व या पशु उसका वध न कर सके और उसकी मृत्यु केवल किसी स्त्री के हाथों ही संभव हो।
इसके बाद ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उसे यह वरदान दे दिया। वरदान पाते ही महिषासुर के भीतर का अहंकार चरम पर पहुंच गया। उसने स्वयं को अजेय मान लिया। उसने सबसे पहले पाताल लोक और पृथ्वी पर अपनी विशाल सेना के साथ आक्रमण किया और वहां के राजाओं को हराकर अपना दास बना लिया। इसके बाद उसने देवलोक पर चढ़ाई कर दी। देवराज इंद्र और महिषासुर के बीच पूरे सौ वर्षों तक भीषण युद्ध चला। अंततः देवताओं की सेना हार गई और महिषासुर ने स्वर्ग के सिंहासन पर कब्जा कर लिया। वह स्वयं इंद्र बनकर बैठ गया और बेघर होकर सभी देवता जंगलों व गुफाओं में छिपने को मजबूर हो गए।
महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर, देवराज इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता भगवान ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा जी उन्हें साथ लेकर भगवान विष्णु और परमेश्वर शिव की शरण में पहुंचे। ऋषियों के आश्रम और देवलोक में असुरों द्वारा किए जा रहे अनाचार को सुनकर भगवान विष्णु और भगवान शिव की आंखें क्रोध से लाल हो गईं। उसी समय, स्वर्ग से निष्कासित देवताओं के दुख को देखकर भगवान विष्णु, महादेव शिव और ब्रह्मा जी के मुख से एक अत्यंत विशाल और दिव्य तेज प्रकट हुआ।
त्रिदेवों के उस महातेज को देखकर वहां उपस्थित देवराज इंद्र, अग्नि, वरुण, यमराज आदि सभी देवताओं के शरीर से भी उनका अपना-अपना तेज निकलकर उस प्रकाश पुंज में विलीन होने लगा। देखते ही देखते वह प्रकाश एक विशाल पर्वत के समान दैदीप्यमान हो गया। उसकी लपटें और चमक तीनों लोकों में फैल गईं। वह दृश्य ऐसा था मानो करोड़ों सूर्य एक साथ उदय हो गए हों।
देवताओं के सामूहिक तेज से उत्पन्न वह प्रकाश पुंज धीरे-धीरे संघनित होने लगा और उसने एक परम सुंदरी, महाशक्तिशाली देवी का रूप धारण कर लिया। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को प्रकट होने वाली इन देवी को देवताओं ने मां दुर्गा के नाम से पुकारा।
भगवान शिव के तेज से उनका मुख, यमराज के तेज से केश, भगवान विष्णु के तेज से भुजाएं, चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघाएं और अग्नि के तेज से उनके त्रिनेत्र प्रकट हुए। मां दुर्गा को साक्षात शक्ति रूप में देखकर देवताओं का खोया हुआ आत्मविश्वास वापस आ गया। महिषासुर के वध के लिए सभी देवताओं ने अपने सबसे शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र और आभूषण देवी को सप्रेम भेंट किए....
भगवान शिव ने अपना त्रिशूल से एक दिव्य त्रिशूल निकालकर दिया।
भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र से एक अमोघ चक्र उत्पन्न कर सौंपा।
देवराज इंद्र ने वज्र और ऐरावत हाथी के गले से महाध्वनि वाला घंटा प्रदान किया।
यमराज ने कालदण्ड और वरुण देव ने दिव्य शंख व पाश दिया।
विश्वकर्मा जी ने अभेद्य कवच-कुल्हाड़े प्रदान किया।
शेषनाग ने नागहार और पर्वतराज हिमालय ने सवारी के लिए पराक्रमी सिंह भेंट किया।
इसके अतिरिक्त अग्निदेव ने शक्ति तो वायुदेव ने धनुष-बाण दिया।
पूरी तरह सुसज्जित होने के बाद, मां दुर्गा ने अपने सिंह पर सवार होकर एक ऐसी भयानक और गगनभेदी गर्जना की, जिससे तीनों लोक हिल उठे। समुद्र उबलने लगा, धरती कांपने लगी और बड़े-बड़े पर्वत चटकने लगे। मां के घंटे की भीषण ध्वनि और शंखनाद से दसों दिशाएं गूंज उठीं।
स्वर्ग में सिंहासन पर बैठे महिषासुर ने जब इस अभूतपूर्व गर्जना को सुना, तो वह भय और आश्चर्य से भर गया। उसने चिल्लाकर पूछा, "यह ब्रह्मांड को कंपा देने वाली ध्वनि किसकी है?" अपनी विशाल आसुरी सेना को साथ लेकर वह उस ध्वनि की दिशा में बढ़ा। वहां उसने देखा कि एक अलौकिक देवी, जिसके मुकुट से पूरा आकाश चमक रहा था और जिसकी भुजाएं दसों दिशाओं में फैली हुई थीं, सिंह पर सवार होकर खड़ी थीं।
महिषासुर के सेनापतियों चिक्षुर, चामर, उदग्र, महाहनु और असिलोमा ने करोड़ों असुरों की सेना के साथ मां दुर्गा पर चारों तरफ से धावा बोल दिया। तोमर, गदा, तलवारों और तीरों की वर्षा होने लगी। लेकिन मां दुर्गा के लिए इन असुरों का संहार करना एक लीला मात्र था। मां ने अपने बाणों की बौछार से असुरों के अस्त्र-शस्त्रों को हवा में ही काट दिया। मां दुर्गा की श्वास मात्र से हजारों देवियां प्रकट हो गईं, जिन्होंने असुरों का समूल नाश करना शुरू कर दिया।
अपने सेनापतियों को मरा देख महिषासुर स्वयं युद्ध में उतरा। वह मायावी था, इसलिए उसने भैंसे का रूप धारण कर पहाड़ों को उखाड़कर देवी की सेना पर फेंकना शुरू किया। मां दुर्गा ने मुस्कुराते हुए अपने पाश से उसे बांध लिया। बंधन में आते ही वह सिंह बना, फिर पुरुष और फिर विशालकाय हाथी बन गया। मां ने हर बार उसके स्वरूप को अपने दिव्य अस्त्रों से निष्फल कर दिया।
अंत में महिषासुर दोबारा अपने मूल भैंसे के रूप में आ गया। नौ दिनों तक यह भयंकर मायावी युद्ध चलता रहा। अंततः, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी और दशमी की संधि बेला में, मां दुर्गा ने अपने पैर से महिषासुर की छाती को दबा दिया। जैसे ही मां ने उसे भूमि पर पटका, महिषासुर के मुख से उसका असली असुर रूप आधा बाहर निकल आया। उसी क्षण, मां दुर्गा ने दिव्य त्रिशूल से महिषासुर की छाती पर भीषण प्रहार किया और अपनी तलवार से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
महिषासुर के वध के बाद आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। महर्षि कात्यायन और देवराज इंद्र समेत सभी देवताओं ने हाथ जोड़कर अश्रुपूर्ण नेत्रों से मां दुर्गा की भावपूर्ण 'शक्रादय स्तुति' की। देवताओं ने मां को 'महिषासुरमर्दिनी' के नाम से संबोधित किया। प्रसन्न होकर मां दुर्गा ने वरदान दिया कि जब-जब पृथ्वी पर विपदा आएगी और भक्त सच्चे मन से उन्हें पुकारेंगे, वे दुष्टों का संहार करने अवश्य प्रकट होंगी।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक मां दुर्गा के इसी प्राकट्य और नौ दिनों के युद्ध की स्मृति में 'शारदीय नवरात्रि' का पावन पर्व मनाया जाता है। इन नौ दिनों में मां के नौ रूपों की पूजा की जाती है, जो हमारे भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी महिषासुर पर विजय पाने का संदेश देता है। वहीं, दशमी तिथि को अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में विजयादशमी का महाउत्सव मनाया जाता है।