मृत्यु से डरें नहीं, समझें उसका रहस्य, क्या सच में इंसान मौत को जीत सकता है? जानिए संतों की अद्भुत सीख
Premanand Maharaj On Death Mystery: धन की कमी,बीमारी या अपमान नहीं बल्कि मृत्यु। लेकिन संतों का कहना है कि यह डर हमारी आसक्ति से पैदा होता है। जब तक हमें शरीर, परिवार और सुख-भोग अत्यंत प्रिय लगते हैं।
- Written By: सिमरन सिंह
premanand ji maharaj (Source. Pinterest)
Premanand Maharaj On Path To Attain God: इंसान की सबसे बड़ी घबराहट क्या है? धन की कमी, बीमारी या अपमान नहीं बल्कि मृत्यु। लेकिन संतों का कहना है कि यह डर हमारी आसक्ति से पैदा होता है। जब तक हमें शरीर, परिवार और सुख-भोग अत्यंत प्रिय लगते हैं, तब तक मृत्यु भयावह प्रतीत होती है। महापुरुषों के अनुसार, मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि प्रभु का स्नेहिल स्पर्श है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि सब कुछ हर लेने वालों में वे “महामृत्यु” हैं। जब मृत्यु भी ईश्वर का ही रूप है, तो फिर अपने ही स्वामी से भय कैसा?
जीवनभर जीने की तैयारी, मरने की नहीं
हम अपना पूरा जीवन कमाने, घर बनाने, अच्छे वस्त्र पहनने और परिवार बसाने में लगा देते हैं। पर क्या कभी सोचा कि मृत्यु के क्षण के लिए हमने क्या तैयारी की? इस मृत्यु लोक में जो जन्मा है, उसका जाना निश्चित है। इसलिए सच्ची साधना वही है, जो मृत्यु के समय मन को स्थिर और निर्भय बना दे। जब विषय-भोगों की इच्छाएं समाप्त होने लगती हैं, तभी मृत्यु पर विजय की शुरुआत होती है।
रोग और संकट में भक्ति की परीक्षा
साधना की असली कसौटी सुख में नहीं, बल्कि दुख में होती है। छोटी-सी बीमारी जैसे बीपी या शुगर आ जाए तो अगर हमारा भजन छूट जाए, तो फिर अंतिम समय के कष्टों का सामना कैसे करेंगे? नाम जप और भगवत स्मरण मनुष्य को वह शक्ति देता है, जिससे वह शरीर के कष्टों को केवल देखता है, उनमें डूबता नहीं। जैसे दूर से आग को देखना और उसमें जलना अलग अनुभव है, वैसे ही भक्ति में रमे व्यक्ति के लिए दुख भी सहने योग्य बन जाता है।
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हमें ऐसा अभ्यास करना चाहिए कि:
- शरीर बीमार हो, फिर भी “राधा-राधा” का जप न रुके।
- लोग साथ छोड़ दें, पर प्रभु का सहारा न छूटे।
- कठिन परिस्थिति आए, फिर भी धर्ममार्ग से कदम पीछे न हटें।
गुरु और सत्संग क्यों हैं आवश्यक?
आध्यात्मिक पथ पर एक तत्वदर्शी गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य माना गया है। सच्चा गुरु वही है, जिसे शास्त्रों का ज्ञान हो और जिसने ब्रह्म का साक्षात्कार किया हो। उत्तम शिष्य वही है, जो विनम्रता से प्रश्न करे और गुरु की कृपा को सर्वोपरि माने। संतों के पास पद, प्रतिष्ठा या धन का प्रदर्शन लेकर नहीं जाना चाहिए, बल्कि दीन भाव से ज्ञान की याचना करनी चाहिए।
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इन्द्रियों पर विजय ही सच्ची जीत
विषय-वासना इतनी प्रबल है कि क्षणभर में बुद्धि को भ्रमित कर सकती है। इसका उपाय है ईश्वर से करुण प्रार्थना और निरंतर नाम जप। जीवन का सच्चा लाभ तभी है, जब हम सबमें एक ही परमात्मा का दर्शन करें। आचरण शुद्ध रखें, नशे से दूर रहें और परिवार व समाज की सेवा को ही सबसे बड़ी भगवत सेवा मानें। जब मन में नाम के प्रति प्रेम जागता है, तभी मृत्यु का भय समाप्त होता है। और तब समझ आता है मृत्यु हार नहीं, परम शांति की ओर पहला कदम है।
