युवा उम्र में ही नींद और आलस्य पर लगाएं लगाम, श्री प्रेमानंद जी महाराज ने बताया साधना का अचूक मार्ग

Shri Premanand Ji Maharaj आध्यात्मिक जीवन का मूल मंत्र बताते है। श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार मनुष्य जीवन केवल खाने, कमाने और सोने के लिए नहीं मिला। यदि आप सत्य और ईश्वर की खोज में निकले हैं।
Control sleep and laziness at a young age, Shri Premanand Ji Maharaj reveals the surefire path to spiritual practice.
premanand ji maharaj (Source. Pinterest)
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Importance of Brahmacharya: अपनी नींद को कम करो Shri Premanand Ji Maharaj यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जीवन का मूल मंत्र है। श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार मनुष्य जीवन केवल खाने, कमाने और सोने के लिए नहीं मिला। यदि आप सत्य और ईश्वर की खोज में निकले हैं, तो सबसे पहले अपने भीतर के शत्रुओं को पहचानना होगा निद्रा, तंद्रा, आलस्य, विक्षेप और संशय। महाराज कहते हैं कि जिनके जीवन में ये पांच दोष अधिक होते हैं, उनका आध्यात्मिक पतन निश्चित है। विशेषकर युवाओं को चेतावनी दी गई है कि अगर अभी से नींद और इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं पाया, तो बुढ़ापे में तमोगुण हावी हो जाएगा और भजन का समय निकल जाएगा।

साधना की पहली सीढ़ी: शरीर और आहार का संयम

साधना केवल मन से नहीं, जीवनशैली से शुरू होती है। शरीर, वस्त्र, आसन और व्यवहार सबमें पवित्रता जरूरी है। जो व्यक्ति स्वाद का दास है, वह कभी इंद्रियों पर विजय नहीं पा सकता। महाराज समझाते हैं कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि यह 24 घंटे तक आपके रक्त और विचारों का निर्माण करता है। इसलिए:

  • संध्या समय भारी भोजन से बचें, यह भजन में अरुचि लाता है।
  • भोजन करते समय टीवी या व्यर्थ वार्तालाप न करें; नाम जप या संत चरित्र का चिंतन करें।
  • हाथ-पैर धोकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पवित्र भाव से भोजन करें।

ब्रह्मचर्य: आध्यात्मिक शक्ति का मूल

महाराज के अनुसार "ब्रह्मचर्य" परम पुरुषार्थ है। आज का युवा भटकाव, फिल्मों और गलत सलाह के कारण अपनी आंतरिक शक्ति को नष्ट कर रहा है। वही शक्ति ओज और तेज में बदल सकती है, यदि उसे संयम से सुरक्षित रखा जाए। वे स्पष्ट कहते हैं कि बिना ब्रह्मचर्य के कठिन आसनों का अभ्यास भी हानिकारक हो सकता है। गृहस्थों को शास्त्रसम्मत मर्यादा में रहकर साधना करने की सलाह दी जाती है।

भजन की विधि और नाम जप का चमत्कार

साधना करते समय मेरुदंड सीधा रखें, दृष्टि नासाग्र या भ्रूमध्य पर टिकाएं और मंत्र का मानसिक जाप करें। शरीर में उत्पन्न तप से घबराएं नहीं यही तप पापों को जलाता है। सबसे सरल और प्रभावी उपाय है नाम जप। श्वास-प्रश्वास के साथ "राधा-राधा" का निरंतर स्मरण आत्मिक ऊर्जा को जागृत करता है। महाराज कहते हैं, "मैं जैसा भी हूँ, अपनी श्री राधा का हूँ।" यदि जिह्वा पर राधा नाम है, तो संसार की कोई बाधा आपको छू नहीं सकती।

सच्ची शरणागति का अनुभव

जब साधक छल, कपट, क्रोध और निंदा का त्याग करता है, तब उसे अनुभव होता है कि भगवान उसके समीप हैं, उसकी रक्षा कर रहे हैं और उसे स्वीकार कर चुके हैं। अंत में संदेश स्पष्ट है नाम का सहारा लें। निरंतर जप ही इस जीवन में मुक्ति का मार्ग खोल सकता है।

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