Bhujariya 2026: राखी के अगले दिन 29 अगस्त को क्यों मनाया जाएगा भुजरिया पर्व? आल्हा-ऊदल से जुड़ी है रोचक कहानी

Bhujariya Parv Ka Itihas: रक्षाबंधन के अगले दिन भुजरिया पर्व मनाया जाएगा। बुंदेलखंड में इस पर्व का विशेष महत्व है और इसका संबंध वीर योद्धाओं आल्हा-ऊदल से जुड़ी रोचक कहानी से माना जाता है।
Bhujariya Parv Ka Mahatva
भुजरिया पर्व(सौ.AI)
Published on: 
Updated on: 

Bhujariya Parv Ka Mahatva : भुजरिया बुंदेलखण्ड का एक लोकपर्व है। लेकिन यह पर्व मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और आसपास के ग्रामीण अंचलों में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व हर साल रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाता है, लेकिन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में भी इसकी धूम कुछ कम नहीं होती है।

आदिवासी वनांचल क्षेत्रों में यह पर्व बड़े ही धूमधाम से हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाता है। इसे कजलियों का पर्व भी कहते हैं। इस साल भुजरिया का पर्व 29 अगस्त को मनाया जाएगा। बुंदेलखंड में महिलाओं के बीच इस परंपरा का खासा महत्व होता है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार,पुराने समय से इस परंपरा को क्षेत्र में निभाया जा रहा है। धूमधाम के साथ भुजरियां लेकर नदियों में पूजा करने के साथ विसर्जित करते है। इस पर्व का जुड़ाव बहनों या लड़कियों से होता है जो मायके में आकर इस परंपरा को निभाती है।

क्या होता है भुजरियां ?

आपको बता दें कि गेहूं और जौ के दानों से भुजरिया उगाई जाती हैं और इसके लिए सावन के महीने की अष्टमी और नवमीं को बांस की छोटी टोकरियों में मिट्टी बिछाकर गेहूं या जौं के दाने बोए जाते हैं।

उसके बाद उन्हें रोजाना पानी दिया जाता है। करीब एक सप्‍ताह में इनमें अंकूर फूट आते हैं और भुजरिया उग आती हैं। बता दें कि भुजरिया पर्व के दिन यही भुजरिया एक-दूसरे को बांटी जाती हैं और बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।

इसके अलावा, इन भुज‍रियों की पूजा भी की जाती है ताकि इस साल अच्‍छी बारिश हो और फसल हो सके। आपको बता दें कि इन भुजरियों की पूजा अर्चना करने के साथ यह कामना की जाती है, कि इस साल बारिश बेहतर हो जिससे अच्छी फसल मिल सकें। जी दरअसल ये भुजरिया चार से छह इंच की होती हैं और नई फसल की प्रतीक होती हैं।

आल्हा-ऊदल से जुड़ी है भुजरिया की पौराणिक कथा

भुजरिया को लेकर पौराणिक कथा है कि राजा आल्हा ऊदल की बहन चंदा से जुड़ी है। आल्हा की बहन चंदा जब सावन महीने में नगर आई तो लोगों ने कजलियों से उनका स्‍वागत किया था। तब से ही यह परंपरा चली आ रही है। कथा के अनुसार, महोबा के सिंह सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान की वीरता आज भी उनके वीर रस से परिपूर्ण गाथाएं बुंदेलखंड की धरती पर बड़े चाव से सुनी व समझी जाती है।

बताया जाता है कि महोबे के राजा के राजा परमाल, उनकी बिटिया राजकुमारी चन्द्रावलि का अपहरण करने के लिए दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोबे पै चढ़ाई कर दी थी। राजकुमारी उस समय तालाब में कजली सिराने अपनी सखी - सहेलियन के साथ गई थी।

राजकुमारी को पृथ्वीराज हाथ न लगाने पाए इसके लिए राज्य के बीर-बांकुर (महोबा) के सिंह सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान की वीरतापूर्ण पराक्रम दिखलाया था। इन दो वीरों के साथ में चन्द्रावलि का ममेरा भाई अभई भी उरई से जा पहुंचे। कीरत सागर ताल के पास में होने वाली ये लड़ाई में अभई वीरगति को प्यारा हुआ, राजा परमाल को एक बेटा रंजीत शहीद हुआ।

बाद में आल्हा, ऊदल, लाखन, ताल्हन, सैयद राजा परमाल का लड़का ब्रह्मा, जैसे वीरों ने पृथ्वीराज की सेना को वहां से हरा के भगा दिया। महोबे की जीत के बाद से राजकुमारी चन्द्रवलि और सभी लोगों अपनी-अपनी कजिलयन को खोंटने लगी। इस घटना के बाद सें महोबे के साथ पूरे बुन्देलखण्ड में कजलियां का त्यौहार विजयोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा है।

इस पर्व कजलियों (भुजरियां) पर गाजे-बाजे और पारंपरिक गीत गाते हुए महिलाएं नर्मदा तट या सरोवरों में कजलियां सिराने के लिए जाती हैं। हरियाली की खुशियां मनाने के साथ लोग एक - दूसरे से मिलेंगे और बड़े बुजुर्ग कजलियां देकर धन - धान्य से पूरित क हने का आशीर्वाद देंगे।

Bhujariya Parv Ka Mahatva
Garud Puran: बेटा न हो तो पिता का श्राद्ध कौन करे? गरुड़ पुराण में बताए गए हैं ये अधिकारी
Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com