द्रौपदी के चीरहरण में भीष्म क्यों रहे मौन? वजह जानकर दंग रह जाएंगे आप
Bhishma Slience: महाभारत का सबसे दर्दनाक प्रसंग जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था आज भी लोगों के मन में एक सवाल छोड़ जाता है: आखिर इतने महान और शक्तिशाली भीष्म पितामह ने उस समय हस्तक्षेप क्यों नहीं किया।
- Written By: सिमरन सिंह
Draupadi Chirharan (Source. Pinterest)
Why Did Bhishma Pitamah Remain Silent: महाभारत का सबसे दर्दनाक प्रसंग जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था आज भी लोगों के मन में एक सवाल छोड़ जाता है: आखिर इतने महान और शक्तिशाली भीष्म पितामह ने उस समय हस्तक्षेप क्यों नहीं किया? यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि कर्तव्य, प्रतिज्ञा और नैतिकता के टकराव की गहरी कहानी है।
राजधर्म और प्रतिज्ञा में बंधे भीष्म
उस समय हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र स्वयं सभा में मौन थे। ऐसे में भीष्म पितामह, जो आजीवन सिंहासन के प्रति निष्ठा की प्रतिज्ञा ले चुके थे, उनके लिए राजा के निर्णय के खिलाफ जाना संभव नहीं था। भीष्म ने अपने जीवन में यह व्रत लिया था कि वे हस्तिनापुर के सिंहासन पर बैठने वाले हर राजा की आज्ञा का पालन करेंगे। यही कारण था कि उनके पास राजा के आदेश का विरोध करने का अधिकार नहीं था।
मौन की कीमत: सम्मान भी, अपमान भी
भीष्म उस समय कौरवों के सबसे आदरणीय और शक्तिशाली योद्धा थे। वे चाहते तो उस घटना को रोक सकते थे, लेकिन ऐसा करने का मतलब होता अपनी प्रतिज्ञा तोड़ना। उन्होंने मौन रहकर अपनी प्रतिज्ञा का सम्मान तो रखा, लेकिन इसके बदले उन्हें युगों-युगों तक आलोचना और अपमान सहना पड़ा। इस घटना ने उनके कर्तव्य और जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े कर दिए। Bhishma
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शक्ति थी, लेकिन निर्णय नहीं
यह सच है कि भीष्म समर्थ और शक्तिशाली थे। उनके पास चीरहरण रोकने की क्षमता भी थी। लेकिन सबसे बड़ी बाधा थी उस समय का निर्णय लेने का संकोच। कई बार व्यक्ति सही और गलत के बीच फंस जाता है, जहां एक तरफ उसका कर्तव्य होता है और दूसरी तरफ उसकी प्रतिज्ञा।
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क्या यह सब नियति का खेल था?
कुछ विद्वानों का मानना है कि यह घटना केवल एक संयोग नहीं थी, बल्कि महाभारत युद्ध की नींव थी। कदाचित, यही वह क्षण था जिसने कौरवों के विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। “तत्कालीन निर्णय लिये जाने के समय नियति का संकोच” शायद प्रारब्ध कुछ और ही चाहता था।
सीख क्या मिलती है?
भीष्म का मौन हमें यह सिखाता है कि
- केवल प्रतिज्ञा निभाना ही पर्याप्त नहीं होता,
- कभी-कभी सही के लिए खड़ा होना भी जरूरी होता है। Bhishma
