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विश्वास करो, सारे बिगड़े काम बन जाएंगे, प्रेमानंद जी महाराज ने बताया समर्पण का सबसे बड़ा रहस्य

Premanand Ji Maharaj: विश्वास करो, सारे बिगड़े काम बन जाएंगे, यह वाक्य केवल एक सांत्वना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जीवन का गहरा सत्य है। जीवन की हर उलझन, हर टूटन और हर अशांति का समाधान है।

  • Written By: सिमरन सिंह
Updated On: Jan 22, 2026 | 06:28 PM

Premanand Ji Maharaj (Source. Pinterest)

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Secrets of Devotion: विश्वास करो, सारे बिगड़े काम बन जाएंगे, यह वाक्य केवल एक सांत्वना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जीवन का गहरा सत्य है। श्री प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, जीवन की हर उलझन, हर टूटन और हर अशांति का समाधान पूर्ण शरणागति में छिपा है। जब साधक ईश्वर के चरणों में स्वयं को पूरी तरह अर्पित कर देता है, तब दिव्य कृपा स्वतः उसके जीवन में उतर आती है।

शरणागति की पहली सीढ़ी: दीनता और सच्चाई

  • समर्पण का पहला लक्षण है नम्रता। सच्ची नम्रता वह है, जिसमें अपमान, निंदा या अस्वीकार होने पर भी मन में अहंकार न आए। जितना व्यक्ति भीतर से झुकता है, उतना ही वह ईश्वर की दृष्टि में महान बनता है।
  • दूसरा स्तंभ है निष्कपटता। मन अक्सर चालाक होता है और ईश्वर से भी छल करने की कोशिश करता है। जब हृदय और वाणी में अंतर रहता है, तब अहंकार शरणागति को अपहरण कर लेता है।
  • तीसरा गुण है सत्यता। वाणी, मन और आचरण तीनों में सत्य का होना आवश्यक है। संसार के सुख और रिश्ते क्षणिक हैं; शाश्वत सत्य केवल नाम, धाम और लीला हैं।

आधा नहीं, पूरा समर्पण चाहिए

महाराज कहते हैं कि अधिकांश लोग ईश्वर को आधा-आधा समर्पण देते हैं कुछ बातें मानते हैं, कुछ अपनी शर्तों पर छोड़ देते हैं। जब व्यक्तिगत इच्छा बची रहती है, तब भक्ति अभिनय बन जाती है।

इतिहास में पीपा जी महाराज जैसे संत हुए, जो गुरु के आदेश पर कुएं में कूदने तक को तैयार थे। सच्चे साधक के लिए गुरु और ईष्ट के अलावा कोई संबंध बड़ा नहीं होता। प्रह्लाद, विभीषण और भरत इसी कारण अमर हुए, क्योंकि उन्होंने ईश्वर को सांसारिक संबंधों से ऊपर रखा।

संत की कठोर दिखने वाली करुणा

पूर्ण समर्पित भक्त सर्वधारता वाला बन जाता है वह स्वयं नीचे उतरकर पतितों को उठाता है। कभी-कभी संत की कृपा कठोर प्रतीत होती है, लेकिन वह आत्मा के कल्याण के लिए होती है। जैसे नारद जी का नलकूबर और मणिग्रीव को शाप देना, जो अंततः उन्हें श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन तक ले गया। ऐसे संत में सर्वाराध्यता भी होती है उनकी उपस्थिति मात्र से आसपास का वातावरण शांत हो जाता है।

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पूर्ण विश्वास और एकनिष्ठता ही पार लगाती है

संसार-सागर से पार होने के लिए पूर्ण विश्वास जरूरी है कि हर स्थिति में भगवान रक्षा करेंगे। इसके बाद आता है अनन्यता ऐसी निष्ठा कि साधक अपने उपास्य के विरुद्ध एक शब्द भी सहन न करे। सांसारिक रिश्ते कुछ दशकों के हैं, लेकिन ईश्वर से संबंध शाश्वत है।

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गुरु-शिष्य संबंध पर गंभीर चेतावनी

महाराज स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि ईश्वर-प्राप्ति से पहले किसी को शिष्य नहीं बनाना चाहिए। गुरु अपने शिष्य के कर्मों का भार उठाता है। गलत मार्गदर्शन देने पर गुरु को भी दंड भोगना पड़ता है।

अंतिम अवस्था: स्वयं को भूल जाना

शरणागति की चरम अवस्था है निज स्वरूप सामर्थ्य विस्मरण। जब साधक अपने अस्तित्व तक को भूलकर ईश्वर में लीन हो जाता है। तब वह सूर्य में विलीन दीपक की तरह हो जाता है। इसीलिए कहा गया है विश्वास करो, सारे बिगड़े काम बन जाएंगे।

Believe me all your problems will be solved premnand ji maharaj revealed the greatest secret of surrender

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Published On: Jan 22, 2026 | 06:28 PM

Topics:  

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