(फाइल फोटो)
नवभारत डेस्क: गुरु पूजन के लिए समर्पित गुरु पूर्णिमा व्रत इस साल रविवार, 21 जुलाई को रखा जाएगा। गुरु पूर्णिमा के दिन महाभारत के रचयिता भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था। इसलिये इस दिन को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरु पूर्णिमा के दिन पूजा-पाठ, दान-पुण्य इत्यादि करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।
इस दिन को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन गुरु पूजन और गुरुओं को गुरु दक्षिणा देने का भी बहुत महत्व है। आइए, जानते हैं गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त, इसका महत्व और इसके पीछे की कथा।
हिन्दू धर्म के अनुसार गुरु पूर्णिमा आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस बार पूर्णिमा की तिथि 20 जुलाई की शाम 6 बजे से शुरू हो जायेगी जो अगले दिन 21 जुलाई को 3 बजकर 47 मिनट तक रहेगी। इसलिए गुरु पूर्णिमा पर्व 21 जुलाई को मनाया जाएगा और व्रत भी 21 को ही रखा जाएगा।
गुरु पूर्णिमा का दिन गुरुओं को समर्पित है। इस दिन सभी को अपने गुरुओं को जरूर याद करना चाहिये। इस दिन गुरुजनों का सम्मान करना चाहिये और उन्हें गुरु दक्षिणा देनी चाहिये। माता-पिता को पहला गुरु माना जाता है इसलिये इस दिन अपने गुरुजनों के साथ-साथ माता-पिता का आशीर्वाद भी जरूर लें। गुरु और गुरु तुल्य लोगों के आशीर्वाद से व्यक्ति को जीवन में सफलता और तरक्की मिलती है। इस दिन पूजा, व्रत और दान-पुण्य का भी बहुत महत्व है। मान्यता है कि जो भी गुरु पूर्णिमा का व्रत करके हैं और दान-पुण्य करते हैं, उन्हें जीवन में ज्ञान की प्राप्ति होती है।
आषाढ़ महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा को महाभारत के रचयिता भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था। इन्हीं के सम्मान में हर साल आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा को लेकर वेद व्यास जी की एक कथा भी प्रचलित है। कथा के अनुसार एक बार अपनी बाल्यावस्था में वेद व्यास ने माता-पिता से भगवान के दर्शन की इच्छा व्यक्त की। इस पर उनकी माता ने उनकी इस इच्छा को पूरी करने से इंकार कर दिया। इच्छा पूरी न होने पर बालक वेद व्यास जिद करने लगे तो माता ने उन्हें जंगल जाने को कह दिया।
माता की आज्ञा का पालन करते हुये जब वेद व्यास वन को जाने लगे तो माता ने उनसे कहा कि जब उन्हें घर की याद आए तो वे लौट आएं। इसके बाद वेद व्यास वन चले गये जहां उन्होंने घोर तपस्या की। कठोर तप से वेद व्यास जी को संस्कृत का ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने चारों वेदों का विस्तार किया और महाभारत, 18 पुराण और ब्रह्मसूत्र की रचना भी की। चारों वेदों के ज्ञाता वेद व्यास जी ने भागवत पुराण का ज्ञान भी दिया। इसी कारण से उनके जन्मोत्सव को गुरु पूर्णिमा को रूप में मनाया जाता है।