बसंत पंचमी पर भूलकर भी न छोड़ें मां सरस्वती की ये आरती, वरना अधूरी रह जाएगी पूजा
Saraswati Vandana: बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की आरती का विशेष महत्व है। मान्यता है कि आरती किए बिना पूजा का पूरा फल प्राप्त नहीं होता। श्रद्धा से की गई आरती से ज्ञान और विद्या का आशीर्वाद मिलता है।
- Written By: सीमा कुमारी
देवी सरस्वती (सौ.सोशल मीडिया)
Maa Saraswati Ki Aarti In Hindi:आज पूरे देशभर में बसंत पंचमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। यह त्योहार हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है जो हर साल माघ महीने में मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन ब्रह्मा जी के मुख से देवी सरस्वती प्रकट हुई थीं, इसलिए इसे उनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।
शास्त्रों में बताया गया है कि, वसंत पंचमी पर पीले वस्त्र पहनना, पीले फूलों से मां का शृंगार करना और विद्या की प्राप्ति के लिए व्रत रखना बहुत फलदायी माना जाता है, लेकिन मां सरस्वती की पूजा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक पूरी श्रद्धा के साथ उनकी आरती न की जाए, तो आइए देवी की आरती पढ़ते हैं
।सरस्वती माता की आरती।।
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता ।
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सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥
जय जय सरस्वती माता…
चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी ।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी ॥
जय जय सरस्वती माता…
बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला ।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला ॥
जय जय सरस्वती माता…
देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया ।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया ॥
जय जय सरस्वती माता…
विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो ।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो ॥
जय जय सरस्वती माता…
धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो ।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो ॥
जय जय सरस्वती माता…
माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे ।
हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे ॥
जय जय सरस्वती माता…
जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता ।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥
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।।सरस्वती माता की आरती।।
ओइम् जय वीणे वाली, मैया जय वीणे वाली
ऋद्धि-सिद्धि की रहती, हाथ तेरे ताली
ऋषि मुनियों की बुद्धि को, शुद्ध तू ही करती
स्वर्ण की भाँति शुद्ध, तू ही माँ करती॥
ज्ञान पिता को देती, गगन शब्द से तू
विश्व को उत्पन्न करती, आदि शक्ति से तू॥
हंस-वाहिनी दीज, भिक्षा दर्शन की
मेरे मन में केवल, इच्छा तेरे दर्शन की॥
ज्योति जगा कर नित्य, यह आरती जो गावे
भवसागर के दुख में, गोता न कभी खावे॥
