

28 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है अटला तद्दे।
विवाहित महिलाएं पति की लंबी उम्र और अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी की कामना करती हैं।
गौरी पूजा के साथ अट्लु यानी छोटा डोसा चढ़ाने की परंपरा है।
Atla Tadde puja vidhi: भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में करवा चौथ की तैयारियां होती हैं, तो दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तेलुगु समुदाय की महिलाएं अटला तद्दे मनाती हैं। इस त्योहार में महिलाएं व्रत रखती हैं और पारंपरिक गीतों-झूलों व अटलु बनाकर मां गौरी की पूजा करती है।
अटला तद्दे 28 अक्टूबर, बुधवार को मनाया जा रहा है। यह त्योहार तेलुगु पंचांग के आश्वयुज मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर मनाया जाता है। आइए जानते हैं कि अटला तद्दे क्या है, महिलाएं इस दिन व्रत क्यों रखती हैं और अट्लु बनाने की परंपरा क्या है।
अटला तद्दे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मनाया जाने वाला पारंपरिक तेलुगु त्योहार है। इसे अटला तद्दी या अट्ला तद्दे भी कहा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से महिलाएं और कुंवारी लड़कियां भी करती है।
इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं। अविवाहित लड़कियां अच्छे जीवनसाथी की कामना से व्रत रखती हैं। इस अवसर पर देवी गौरी की पूजा की जाती है और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है।
अटला तद्दे की मान्यता के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या की थी। इसी आस्था से जुड़कर महिलाएं अपने वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए गौरी पूजा करती हैं। इसमें महिलाएं दिनभर व्रत रखती हैं और शाम को पूजा करती हैं। चंद्रमा के दर्शन और पूजा के बाद व्रत खोलती हैं।
इस त्योहार की तैयारियां कई घरों में एक दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। महिलाएं हाथों पर मेहंदी लगाती हैं और पारंपरिक कपड़े पहनती हैं। कुछ क्षेत्रों में लड़कियां सुबह झूले झूलती हैं और त्योहार से जुड़े लोकगीत गाती हैं।
सुबह की तैयारी: कई परिवारों में महिलाएं सूर्योदय से पहले उठकर चावल, दही और गोंगुरा की चटनी जैसे पारंपरिक भोजन का सेवन करती हैं। इसके बाद व्रत शुरू होता है।
गौरी पूजा: शाम को देवी गौरी की पूजा की जाती है। पूजा में हल्दी, कुमकुम, फूल और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।
चंद्र दर्शन: रात में चंद्रमा के दर्शन कर पूजा की जाती है।
अट्लु का भोग: देवी गौरी को भोग के रूप में अट्लु अर्पित किए जाते हैं। कई परिवारों में इन्हें अन्य विवाहित महिलाओं को भी दिया जाता है।
व्रत का पारण: पूजा और चंद्र दर्शन के बाद महिलाएं अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत खोलती हैं।
अटला तद्दे की सबसे खास परंपराओं में से एक है अट्लु बनाना। अट्लु छोटे डोसे जैसे पकवान होते हैं, जिन्हें आमतौर पर चावल और उड़द दाल के घोल से तैयार किया जाता है। इन्हें देवी गौरी को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है।
इन्हें बनाने के लिए चावल और उड़द दाल को भिगोकर पीसा जाता है और घोल को फर्मेंट होने दिया जाता है। इसके बाद तवे पर छोटे-छोटे डोसे बनाए जाते हैं और अन्य महिलाओं में भी बांटे जाते हैं।