Mahashivratri 2025: आखिर किसने किया था सबसे पहले शिवलिंग का पूजन, जानिए इसके पीछे की पौराणिक मान्यता
इस महाशिवरात्रि जैसे दिन को लेकर शिवभक्तों में खासा उत्साह होता है तो वहीं पर कहते है कि इस दिन सच्चे मन से जो भी आराधना करता है भगवान उसकी मनोकामना पूरी कर देते है।
- Written By: दीपिका पाल
महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पूजा का महत्व (सौ.सोशल मीडिया)
Mahashivratri 2025: भगवान शिव की आराधना का पावन दिन यानि महाशिवरात्रि इस साल 26 फरवरी को मनाई जाएगी। इस खास दिन को लेकर शिवभक्तों में खासा उत्साह होता है तो वहीं पर कहते है कि इस दिन सच्चे मन से जो भी आराधना करता है भगवान उसकी मनोकामना पूरी कर देते है।
महाशिवरात्रि को भगवान शिव की कृपा के लिए सबसे खास माना जाता है लेकिन कभी आपने विचार किया है आखिर किसने सबसे पहले शिवलिंग का पूजन किया था और महाशिवरात्रि से क्या संबंध जुड़ा है चलिए जानते है।
महाशिवरात्रि के दिन हुई थी शिवलिंग की उत्पत्ति
आपको बताते चलें कि, महाशिवरात्रि के दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन ही शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी। इस दिन भगवान शिव के शिवलिंग स्वरूप की भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने सबसे पहले पूजा अर्चना की थी। कहा जाता है कि, महाशिवरात्रि के पर्व के दौरान आज भी शिवलिंग की विधि-विधान से पूजा होती है, और शिवलिंग का रुद्राभिषेक किया जाता है।
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जानिए महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथा
महाशिवरात्रि के दिन की पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के द्वारा समुद्र मंथन किया जा रहा था तो सबसे पहले समुद्र से विष की उत्पत्ति हुई। इस विष के चलते सारी सृष्टि में हाहाकार मच गया। इसके बाद सृष्टि की रक्षा करने के लिए भगवान शिव आगे आए और उन्होंने विष पान किया। माना जाता है कि फाल्गुन माह की चतुर्दशी तिथि के दिन ही शिव जी ने विष का पान किया था और उसी दिन इन्हें नीलकंठ नाम मिला था, क्योंकि विष पीने के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया था।
इसके बाद विष असर को कम करने के लिए देवी-देवताओं और असुरों ने शिव जी पर जल, भांग, धतूरा, बेलपत्र आदि चीजें अर्पित की थीं। इसलिए भी महाशिवरात्रि के दिन शिव पूजन करना शुभ माना जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान शिव ने जगत की रक्षा की थी।
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माता पार्वती को अर्धांगिनी के रूप में किया था स्वीकार
आपको बताते चलें कि, महाशिवरात्रि को लेकर यह भी बताया जाता है कि, इस दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। माना जाता है कि इसी दिन शिव जी ने माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था और शिव-शक्ति एक हुए थे। इस वजह से ही कुंवारी कन्याओं और युवकों को व्रत करने की सलाह दी जाती है ताकि सुयोग्य वर की प्राप्ति हो सकें।
