राष्ट्रीयता के लिए हो रहे हैं युद्ध: मोहन भागवत ने मनुष्य के अस्तित्व को लेकर कही बड़ी बात

Mohan Bhagwat: RSS प्रमुख मोहन भागवत ने जयपुर में एकात्म मानवदर्शन पर बोलते हुए राष्ट्रवाद के कारण हो रहे युद्धों, असमान विकास और बढ़ती मानवीय कमजोरी पर चिंता जताई।
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RSS प्रमुख मोहन भागवत (सोर्स- ANI/X)
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RSS Chief Mohan Bhagwat On Wars: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लिया। यह कार्यक्रम एकात्म मानवदर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित दीनदयाल स्मृति व्याख्यान था। इस मौके पर उन्होंने एकात्म मानवदर्शन के 60 वर्ष पूरे होने पर बात की और दुनिया की वर्तमान स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। भागवत ने आधुनिक विकास, असमानता और वैश्विक संघर्षों को लेकर कई बड़े प्रश्न उठाए, जो मनुष्य के अस्तित्व को चुनौती दे रहे हैं।

एकात्म मानवदर्शन और बदलते विश्व के परिदृश्य पर बात

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि एकात्म मानवदर्शन को सबके सामने रखे जाने के समय और आज के विश्व के परिदृश्य में एक बहुत बड़ा अंतर है। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय के समय इस दर्शन के व्यापक प्रयोग के लिए आवश्यक परिस्थितियां नहीं थीं, लेकिन आज धीरे-धीरे संपूर्ण विश्व के लोग इस मान्यता पर आ रहे हैं। यह दर्शाता है कि एकात्म मानवदर्शन की प्रासंगिकता समय के साथ बढ़ी है।

ज्ञान बढ़ा, लेकिन शांति का क्या?

RSS प्रमुख ने आधुनिक विज्ञान और ज्ञान की प्रगति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विज्ञान की पद्धति अपने चरम की ओर जा रही है और मनुष्य का ज्ञान बहुत बढ़ गया है। उन्होंने तकनीक के लाभ गिनाए जैसे एक क्लिक पर संदेश भेजना और तुरंत उत्तर पाना। इसके बावजूद, उन्होंने एक महत्वपूर्ण सवाल किया, "क्या इतनी सुविधाएं प्राप्त होने के बाद भी मनुष्य के मन में शांति है?" यह सवाल दिखाता है कि फिजिकल प्रोग्रेस ने भले ही जीवन को आसान बना दिया हो, लेकिन यह मेंटल पीस सुनिश्चित नहीं कर पाई है।

मानव की कमजोरी के पीछे असमान विकास है मुख्य कारण

मोहन भागवत ने मनुष्य की बढ़ती कमजोरी पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि मानव, जो कभी जलवायु के सभी उतार-चढ़ावों को आसानी से झेल सकता था, आज तेजी से कमजोर होता जा रहा है। उनके अनुसार इसका मुख्य कारण यह है कि तथाकथित विकास और प्रगति सभी तक नहीं पहुंच पाई है। उन्होंने इस असमानता को स्पष्ट करते हुए कहा कि एक पूरा वर्ग ऐसा है जिसने इस विकास को देखा ही नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि जो संसाधन विकास से वंचित बहुसंख्यक (Disadvantaged Majority) लोगों से प्राप्त किए जा रहे हैं उन्हीं का उपभोग गिने-चुने लोग कर रहे हैं।

राष्ट्रीयता के नाम पर वैश्विक युद्ध

वैश्विक संघर्षों पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि आज वैश्विक स्तर पर हो रहे युद्धों के तरीके बदले हैं। उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि "राष्ट्रीयता के कारण दुनिया में युद्ध हो रहे हैं।" उन्होंने आगे कहा कि अंतर्राष्ट्रीयता की बात करने के बावजूद, कुछ शक्तिशाली देश कमजोर देशों पर अपना अधिकार थोपते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बलवानों की लड़ाई के कारण बाकियों को कष्ट उठाना पड़ रहा है। उन्होंने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक अन्य विसंगति की ओर भी इशारा किया, जितनी दवाइयां निकली हैं, उतनी ही बीमारियां भी निकली हैं, जिससे मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई है।

बढ़ती खाई और अस्तित्व का सवाल

भागवत ने आर्थिक असमानता की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने चौंकाने वाला आंकड़ा दिया कि 4 फीसदी लोग विश्व के 80 फीसदी संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं। इस कारण दुनिया में अमीर और अमीर होता जा रहा है जबकि गरीब और गरीब। यह खाई बढ़ती जा रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मनुष्य जाति का विकास तो हो रहा है, लेकिन "मनुष्य का अस्तित्व रहेगा या नहीं, यह एक बड़ा प्रश्न है।"

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