पंजाब में बर्बाद हो रही पीढ़ी: 3 दशक, कई सरकारें, लेकिन नहीं थमा नशे का काला कारोबार, आखिर कौन है जिम्मेदार?

Punjab Drug Problem: पंजाब में नशे का संकट लगातार गहराता जा रहा है। करोड़ों लोग इसकी चपेट में हैं, जबकि बच्चों तक पहुंच चुकी यह समस्या सरकार और समाज के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। पढ़ें ये खास रिपोर्ट।
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सांकेतिक तस्वीर (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Punjab Drug Addiction Problem: पंजाब पिछले करीब तीन दशकों से नशे के दानव से लड़ रहा है। हर बार चुनाव आते हैं, सरकारें बदलती हैं, नए वादे किए जाते हैं और "नशे के खिलाफ युद्ध" का ऐलान होता है। लेकिन जमीनी हकीकत आज भी डराने वाली है। संसदीय समिति और अदालतों की टिप्पणियां बताती हैं कि नशे की जड़ें पंजाब में बहुत गहराई तक धंस चुकी हैं।

आंकड़ों की बात करें तो स्थिति बेहद गंभीर है। एक अनुमान के मुताबिक, पंजाब की करीब 3 करोड़ की आबादी में से लगभग 66 लाख लोग किसी न किसी तरह के नशे की चपेट में हैं। इसमें 21 लाख से ज्यादा लोग ओपियोइड (अफीम और हेरोइन) का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर जानलेवा है।

बच्चों पर भी नशे का साया

सबसे दुखद पहलू यह है कि इस दलदल में बच्चे भी फंसते जा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 6.97 लाख बच्चे नशे के प्रभाव में हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि पंजाब के भविष्य पर लगा एक बड़ा सवालिया निशान है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस स्थिति को ‘खतरनाक स्तर’ पर बताया है।

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पंजाब में नशे के आदि हैं युवा (सोर्स- सोशल मीडिया)

अदालत का मानना है कि यह केवल अपराध का मामला नहीं है, बल्कि एक सामाजिक और स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा संकट है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि नशा पंजाब के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह तबाह कर रहा है।

नशा मुक्ति केंद्रों की ऐसी है हालत

सरकारें दावा करती हैं कि वे नशा छुड़ाने के लिए सुविधाएं बढ़ा रही हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही कहती है। सरकारी नशा मुक्ति केंद्रों में ठीक होने की दर  मात्र 1.5% ही दर्ज की गई है। यानी 100 में से बमुश्किल एक या दो लोग ही पूरी तरह नशा छोड़ पा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नशा छुड़ाना सिर्फ दवा देने का काम नहीं है, बल्कि इसमें लंबी काउंसलिंग और परिवार के साथ की जरूरत होती है । सही पुनर्वास और देखभाल की कमी के कारण लोग इलाज के बाद फिर से नशे की ओर मुड़ जाते हैं, जिससे यह चक्र कभी टूटता ही नहीं है ।

पुलिस की कार्रवाई देख बदला तस्करी का तरीका

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तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करती करती रहती है पंजाब पुलिस (सोर्स- सोशल मीडिया)

पंजाब पुलिस ने हाल के वर्षों में नशे के खिलाफ अभियान काफी तेज किया है। जुलाई 2022 से जुलाई 2023 के बीच ही 12,218 एफआईआर दर्ज की गई हैं। आंकड़ों के अनुसार, हेरोइन की बरामदगी में 147% और सिंथेटिक ड्रग्स (जैसे क्रिस्टल मेम) की जब्ती में 447% की भारी बढ़ोतरी हुई है। पकड़-धकड़ तो बढ़ रही है, लेकिन तस्करी करने वाले नेटवर्क भी अब हाई-टेक हो गए हैं। अब सीमा पार से नशे की सप्लाई के लिए ड्रोन का इस्तेमाल हो रहा है। जैसे-जैसे पुलिस सख्ती करती है, वैसे-वैसे ये नेटवर्क अपने तरीके बदल लेते हैं, जिससे इन्हें जड़ से खत्म करना मुश्किल हो रहा है।

हो रहा है आर्थिक और सामाजिक नुकसान

नशे की मार सिर्फ नशा करने वाले पर नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार पर भी पड़ती है। इलाज के खर्च और कमाई बंद होने से परिवार कर्ज में डूब जाते हैं। इसके कारण पंजाब की अर्थव्यवस्था और वर्क-फोर्स पर भी बुरा असर पड़ रहा है, जो लंबे समय में राज्य के विकास को रोक सकता है।

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पंजाब में नशे कारण हो रहा सामाजिक और आर्थिक नुकसान (सोर्स- सोशल मीडिया)

जमीनी विशेषज्ञों का तर्क है कि सिर्फ गिरफ्तारियां करने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक नशे की सप्लाई के साथ-साथ इसकी मांग को कम करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। इसमें वित्तीय जांच और तस्करी के पैसे के रास्तों को बंद करना भी जरूरी है।

सियासत से ऊपर उठकर सोचने की जरूरत

पंजाब का यह संकट किसी एक पार्टी या सरकार का फेलियर नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की परीक्षा है। हर सरकार ने नई योजनाएं बनाईं और समय सीमा तय की, लेकिन स्थायी नतीजे अब भी कोसों दूर हैं। इसे सिर्फ चुनावी मुद्दा बनाने के बजाय एक मिशन के रूप में लेने की जरूरत है। सच्चा बदलाव तभी आएगा जब सरकार की नीयत साफ होगी और प्रशासन पूरी ताकत के साथ काम करेगा । जांच को मजबूत करना, दोषियों को सजा दिलाना और नशे के शिकार लोगों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाना ही इसका एकमात्र समाधान है। पंजाब की जवानी को बचाने के लिए अब और देरी करना भारी पड़ सकता है।

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