'गुनाहों का देवता' के महान लेखक धर्मवीर भारती जी की पुण्यतिथि, जानिए पद्मश्री से सम्मानित लेखक का सफर

Dharmveer Bharti Death Anniversary: हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष धर्मवीर भारती की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी जा रही है। 'गुनाहों का देवता' और 'अंधा युग' जैसी उनकी रचनाएं सदा अमर रहेंगी।
Dharmveer Bharti Death Anniversary Special
धर्मवीर भारती जी की पुण्यतिथि(सोर्स- AI)
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Dharmveer Bharti Death Anniversary Special: हिंदी साहित्य के महान रचनाकार डॉ. धर्मवीर भारती की पुण्यतिथि पर साहित्य जगत उन्हें श्रद्धापूर्वक याद कर रहा है। गुनाहों का देवता, अंधा युग और सूरज का सातवां घोड़ा जैसी उनकी कालजयी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच उतनी ही लोकप्रिय हैं। उनकी लेखनी में प्रेम, संघर्ष, मानवीय संवेदना और जीवन की जटिलताओं की गहरी झलक मिलती है।

प्रयागराज से शुरू हुआ साहित्यिक सफर

धर्मवीर भारती का जन्म 25 सितंबर 1926 को इलाहाबाद के अहियापुर में हुआ था। छात्र जीवन से ही उनकी रुचि लेखन और पत्रकारिता में थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यापन किया और प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था ‘परिमल’ से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे।

साल 1960 में उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और मुंबई जाकर लोकप्रिय पत्रिका ‘धर्मयुग’ का संपादन संभाला। इसके बाद मुंबई उनके जीवन और कर्मभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। हालांकि प्रयागराज से उनका भावनात्मक जुड़ाव हमेशा कायम रहा।

‘गुनाहों का देवता’ ने बनाई अलग पहचान

धर्मवीर भारती की सबसे चर्चित रचनाओं में उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ का नाम सबसे ऊपर आता है। प्रेम, त्याग, सामाजिक मर्यादाओं और भावनात्मक द्वंद्व को केंद्र में रखकर लिखा गया यह उपन्यास हिंदी साहित्य की अमर कृतियों में गिना जाता है।

प्रयागराज की स्मृतियां भी उनके लेखन में दिखाई देती हैं। ‘गुनाहों का देवता’ में प्रयाग के नगर देवता की कल्पना उनके शहर से गहरे लगाव को दर्शाती है। उनकी भाषा और कथाशैली ने पाठकों के मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ा।

गद्य के साथ कविता में भी योगदान

धर्मवीर भारती ने केवल उपन्यास और कहानी के क्षेत्र में ही अपनी पहचान नहीं बनाई, बल्कि कविता और नाटक में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘अंधा युग’ को आधुनिक हिंदी नाटक की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल किया जाता है। वहीं ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ उनकी अनूठी कथाशैली का उदाहरण है।

उनके काव्य संग्रह ‘ठंडा लोहा’, ‘सात गीत वर्ष’ और ‘कनुप्रिया’ ने हिंदी कविता को नई संवेदना और सौंदर्य दिया। साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें 1972 में पद्मश्री सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।

‘धर्मयुग’ और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

धर्मयुग से जुड़े उनके सहयोगी आलोक श्रीवास्तव के अनुसार, 4 सितंबर 1997 को धर्मयुग मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट से जीत का फैसला आया था। भारती इस खबर से बेहद खुश थे और उन्होंने अपने सहयोगियों के लिए पार्टी देने की बात भी कही थी।

लेकिन उसी दिन मुंबई लौटने के बाद उनके निधन की खबर सामने आई। 4 सितंबर 1997 को हिंदी साहित्य ने अपने एक बेहद प्रभावशाली रचनाकार को खो दिया। उनके जाने से साहित्य जगत में एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ, जिसे भर पाना संभव नहीं था।

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रचनाओं में दिखाई देता था पराजय-बोध

धर्मवीर भारती की रचनाओं में जीवन के संघर्ष और पराजय का भाव भी प्रमुखता से दिखाई देता है। ‘अंधा युग’ में उन्होंने युद्ध और मानवीय त्रासदी के जरिए सत्य-असत्य के संघर्ष की जटिलता को सामने रखा।

पराजित पीढ़ी का गीत और प्रमथ्यु गाथा जैसी रचनाओं में भी उनके भीतर का यह गहरा बोध दिखाई देता है। उनकी साहित्यिक दृष्टि ने स्वतंत्रता के बाद के भारतीय समाज के आदर्शों, संघर्षों और विडंबनाओं को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।

धर्मवीर भारती का साहित्य आज भी नई पीढ़ी को पढ़ने, सोचने और जीवन को नए नजरिए से समझने के लिए प्रेरित करता है। यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक विरासत है।

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