उज्जैन के सांदीपनी गुरुकुल में भगवान श्रीकृष्ण ने की थी शिक्षा ग्रहण, जानिए भारत के प्राचीन गुरूकुल के बारे में
आज गुरू पूर्णिमा का त्योहार मनाया जा रहा है जो दुनियाभर के प्राचीन से लेकर नवीनतम गुरूओं को समर्पित होता है। ऐसे ही गुरू और शिष्य से जुड़े एक ऐसे स्थान गुरूकुल की बात करें तो, देश के कई हिस्सों में स्थित है औऱ नई खासियत रखते है।
- Written By: दीपिका पाल
आज देशभर में गुरू पूर्णिमा का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है इस खास दिन को गुरूओं को समर्पित माना जाता है तो वहीं पर आज के दिन अपने इष्ट या गुरूओं का विधि-विधान से पूजन कर आशीर्वाद लेन का निय म होता है। आप देश के प्राचीन गुरूओं के बारे में तो जानते है जिनका संबंध गुरूकुल औऱ शिष्यों से होता है, एक ऐसा स्थान जहां पर गुरू अपने शिष्यों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी पुरुषार्थों की शिक्षा देते हैं जिससे युग पुरूष निकलते है। चलिए जानते हैं ऐसे ही कुछ प्राचीन गुरूकुल के बारे में..
सांदीपनी गुरूकुल- यह मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित सबसे प्राचीन गुरूकुल में से एक है जहां पर अपने गुरू महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में रहकर भगवान श्रीराम ने अपने भाईयों के साथ विद्या ग्रहण की थी। वहीं पर भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपने भैया बलदाऊ के साथ महर्षि सांदीपनी के सानिध्य में राजनीति शास्त्र, कूटनीति, अर्थशास्त्र, नैतिक शिक्षा, धर्म, कर्म, मोक्ष, न्याय दर्शन आदि विषयों की शिक्षा ग्रहण की थी।
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विक्रमशिला गुरुकुल- बिहार के भागलपुर में एक और प्राचीन गुरूकुल स्थित है जहां पर चार तोरण के इतिहास द्वार बनें हुए है। यहां पर हर एक तोरण द्वार पर प्रवेशिका परीक्षागृह स्थित है जहां पर जो भी शिष्य परीक्षा ग्रहण करने आते है उन्हें सबसे पहले द्वारस्थ विद्वानों को परीक्षा देनी होती है। इस गुरूकुल की खासियत है कि, यहां पर रत्नवज्र, लीलावज, दीपंकर, श्रीज्ञान, बोधिभद्र, कमलरक्षित आदि आठ महागुरु कुलपति और 108 गुरु की विशेषता है। कहा जाता है इस गुरूकुल में धर्म न्याय दर्शन और तंत्र के अध्ययन की शिक्षा दी जाती थी।
नालंदा गुरूकुल- प्राचीन भारत के प्रमुख गुरूकुल में से एक यह गुरूकुल बिहार के नालंदा में स्थित है जहां पर सम्पूर्ण जगत् भारतीय ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, कला एवं सभ्यता संस्कृति की झलक देखने के लिए मिलती है। यहां के चीनी स्नातक ह्वेनसांग के अनुसार नालन्दा में 10,000 से अधिक शिक्षार्थी थे। विद्याध्ययन के लिए गुरुजनों की संख्या 1,500 थी। गुरुकुल में मुख्य गुरु शीलभद्र थे।गुरुकुल में शिक्षा क्षेत्र में जिनमित्र, चन्द्रपाल, ज्ञानचन्द्र, प्रभाकरमित्र, भद्रसेन आदि प्रकाण्ड विद्वान थे, जिनमें आचार्य शान्तरक्षित का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
तक्षशिला गुरूकुल- प्राचीन भारत में तक्षशिला गुरूकुल का नाम भी आता है जिसका संबंध पाकिस्तान से लगाया जाता है यहां पर गुरूकुल में 18 विद्याएं विशेष रूप से अर्थशास्त्र राजनीति और आयुर्वेद के अध्ययन के लिए देश-विदेश से शिक्षार्थी आते थे। इसका निर्माण इतिहासकारों के दो पुत्र थे-तक्ष और पुष्करपुर ने पुष्करावर्त एवं क्षतक्षशिला नगरी बसाई थी। यहां पर कई विद्याओं की शिक्षा दी जाती है।
