डेलाइट सेविंग टाइम से जुड़ी 10 रोचक बातें जो शायद आप नहीं जानते, जानिए क्यों साल में दो बार बदलती है घड़ी
10 Interesting Facts About Daylight Saving Time: डेलाइट सेविंग टाइम क्या है, इसकी शुरुआत क्यों हुई, किन देशों में लागू है और इससे जुड़े 10 रोचक तथ्य जानिए इस खास फोटो गैलरी में।
- Written By: वंदना शर्मा
क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया के कई देशों में लोग साल में दो बार अपनी घड़ियों का समय बदलते हैं? दरअसल, इसे डेलाइट सेविंग टाइम कहा जाता है। इसमें गर्मियों की शुरुआत में घड़ी को एक घंटा आगे और सर्दियों में एक घंटा पीछे कर दिया जाता है। इसका उद्देश्य दिन की प्राकृतिक रोशनी का अधिकतम उपयोग करना और शाम के समय अधिक उजाला उपलब्ध कराना है। हालांकि, यह व्यवस्था जितनी दिलचस्प है, उतनी ही विवादित भी रही है। कुछ लोग इसे ऊर्जा बचाने का बेहतर तरीका मानते हैं, जबकि कई विशेषज्ञ अब इसकी उपयोगिता पर सवाल उठाते हैं।
डेलाइट सेविंग टाइम का विचार सबसे पहले 18वीं शताब्दी में अमेरिकी वैज्ञानिक और राजनेता बेंजामिन फ्रैंकलिन ने मजाकिया अंदाज में रखा था। उन्होंने सुझाव दिया था कि अगर लोग सुबह जल्दी उठेंगे तो मोमबत्तियों की खपत कम होगी। हालांकि, इसे गंभीरता से पहली बार 20वीं सदी की शुरुआत में लिया गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1916 में जर्मनी और ऑस्ट्रिया ने ईंधन और ऊर्जा बचाने के उद्देश्य से इसे लागू किया। इसके बाद कई यूरोपीय देशों और अमेरिका ने भी इस व्यवस्था को अपनाया।
यूक्रेन में 4 भारतीय की मौत पर भारत ने जताई नाराजगी, बंदरगाह पर खड़े जहाज पर हुआ हमला
नए पीएम के आते ही उप-प्रधानमंत्री का डेविड लैमी इस्तीफा, ब्रिटेन सियासी हलचल तेज, जाते-जाते दी बड़ी चेतावनी
कुर्सी संभालते ही एक्शन में आए एंडी बर्नहैम, नेताओं को लेकर दिया सख्त बयान, बोले- बेहतर की उम्मीद- VIDEO
पहले बताओ कारगिल में कितने मरे… पाकिस्तानी मौलाना ने आसिम मुनीर की निकाली हेकड़ी, कुरेदा 27 साल पुराना जख्म
जिन देशों में डेलाइट सेविंग टाइम लागू होता है, वहां आमतौर पर मार्च के महीने में घड़ी को एक घंटा आगे कर दिया जाता है। इसका मतलब है कि लोगों की सुबह थोड़ी जल्दी शुरू होती है और शाम को अधिक देर तक प्राकृतिक रोशनी मिलती है। इसके बाद अक्टूबर या नवंबर में घड़ी को फिर एक घंटा पीछे कर दिया जाता है ताकि सर्दियों में सुबह जल्दी उजाला हो सके। दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश देशों में यह बदलाव रात 2 बजे किया जाता है, ताकि लोगों की दिनचर्या पर कम से कम असर पड़े।
डेलाइट सेविंग टाइम का असर केवल समय पर नहीं, बल्कि इंसान के शरीर पर भी पड़ता है। जब घड़ी अचानक एक घंटा आगे या पीछे होती है, तो शरीर की बॉडी क्लॉक को नए समय के अनुसार ढलने में कुछ दिन लग सकते हैं। कई लोगों को शुरुआती दिनों में नींद पूरी न होने, थकान, चिड़चिड़ापन और काम में ध्यान न लगने जैसी समस्याएं महसूस होती हैं। कुछ चिकित्सा अध्ययनों में समय बदलने के बाद शुरुआती दिनों में सड़क दुर्घटनाओं और तनाव से जुड़ी घटनाओं में भी हल्की बढ़ोतरी देखी गई है।
भारत में डेलाइट सेविंग टाइम लागू न होने के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं। देश में पहले से ही इंडियन स्टैंडर्ड टाइम पूरे देश के लिए लागू है। भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां दिन और रात की लंबाई में यूरोप या उत्तरी अमेरिका जितना बड़ा अंतर नहीं आता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत में DST लागू भी किया जाए, तो इससे ऊर्जा बचत बहुत सीमित होगी, जबकि रेलवे, उड़ानों, स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और कारोबार के समय में अनावश्यक जटिलताएं बढ़ सकती हैं।
डेलाइट सेविंग टाइम लागू करने का सबसे बड़ा तर्क बिजली की बचत रहा है। पहले जब रोशनी के लिए बल्ब और स्ट्रीट लाइट पर अधिक निर्भरता थी, तब इसका फायदा भी देखने को मिला। लेकिन आज एयर कंडीशनर, कंप्यूटर, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और 24×7 कामकाज वाली जीवनशैली के कारण कई शोध बताते हैं कि ऊर्जा की बचत पहले जैसी नहीं रही। कुछ अध्ययनों में तो यह भी सामने आया कि शाम को अधिक समय तक बाहर रहने के कारण बिजली की खपत बढ़ भी सकती है। इसलिए इसकी प्रभावशीलता को लेकर लगातार बहस होती रहती है।
बहुत से लोग सोचते हैं कि पूरी दुनिया में डेलाइट सेविंग टाइम लागू होता है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। आज दुनिया के 200 से अधिक देशों और क्षेत्रों में से केवल लगभग 70 देश ही किसी न किसी रूप में इसका पालन करते हैं। यूरोप, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के कई हिस्सों में यह लागू है, जबकि भारत, चीन, जापान, सिंगापुर और अधिकांश एशियाई व अफ्रीकी देशों में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता। यानी दुनिया की बड़ी आबादी बिना घड़ी बदले ही पूरे साल एक ही समय का पालन करती है।
डेलाइट सेविंग टाइम को लेकर दुनिया भर में बहस लगातार तेज होती जा रही है। यूरोपियन यूनियन के कई सदस्य देशों और अमेरिका के कुछ राज्यों में इसे स्थायी रूप से खत्म करने या पूरे साल एक ही समय लागू रखने की मांग उठ चुकी है। कुछ लोगों का कहना है कि आज के समय में इसके फायदे बहुत कम हैं, जबकि लोगों की दिनचर्या, स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय समय-समन्वय पर इसका असर अधिक पड़ता है। यही कारण है कि कई देशों ने इसे बंद कर दिया है और कई अन्य इस पर विचार कर रहे हैं।
जब किसी देश में घड़ी का समय बदलता है तो इसका प्रभाव केवल आम लोगों तक सीमित नहीं रहता। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के समय, रेलवे शेड्यूल, ऑनलाइन मीटिंग, वैश्विक कारोबार, शेयर बाजार, बैंकिंग सेवाएं और आईटी कंपनियों के कामकाज में भी बदलाव करना पड़ता है। अलग-अलग देशों में अलग-अलग तारीखों पर DST लागू होने के कारण कई बार समय का अंतर बदल जाता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपने शेड्यूल दोबारा तय करने पड़ते हैं।
तकनीक और बदलती जीवनशैली के इस दौर में डेलाइट सेविंग टाइम का भविष्य लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक ऊर्जा प्रणाली और स्मार्ट टेक्नोलॉजी के दौर में इसकी जरूरत पहले जैसी नहीं रही। वहीं कुछ लोग अब भी इसे उपयोगी मानते हैं क्योंकि इससे शाम के समय अधिक रोशनी मिलती है और कई गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है। आने वाले वर्षों में कई देश इस व्यवस्था में बदलाव कर सकते हैं या इसे पूरी तरह समाप्त भी कर सकते हैं। फिलहाल यह तय है कि डेलाइट सेविंग टाइम दुनिया के सबसे चर्चित और विवादित समय प्रबंधन प्रयोगों में से एक बना हुआ है।
