

Yavatmal Drought Sharecropper Farmers: यवतमाल में सूखा घोषित होने के बाद खेत मालिकों के साथ भूमिहीन खेत मजदूरों और बटाईदार किसानों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। फसल खराब होने और जमीन अपने नाम नहीं होने के कारण कई बटाईदार सरकारी सहायता, फसल बीमा और कर्जमाफी जैसी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं
यवतमाल जिले में सूखा घोषित होने के बाद अब खेती पर निर्भर खेत मजदूरों और बटाईदार किसानों के सामने भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है। लगातार बारिश की कमी के कारण खेती का कारोबार प्रभावित हुआ है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ा है, जिनकी रोजी-रोटी खेतों में मिलने वाले काम या बटाई की खेती पर निर्भर है।
खेत मजदूरों के लिए बारिश नहीं होने का मतलब खेतों में काम के अवसर कम होना है। काम घटने से आमदनी प्रभावित हुई है और परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। मनरेगा के माध्यम से भी पर्याप्त रोजगार नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
दूसरी ओर, बटाई पर खेती करने वाले किसानों ने फसल खड़ी करने के लिए साहूकारों के साथ-साथ बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लिया था। सूखे की स्थिति में फसल बर्बाद होने से अब उनके सामने कर्ज चुकाने की चुनौती खड़ी हो गई है।
बटाईदार किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि खेती की जमीन उनके नाम पर नहीं होती। ऐसे में सरकारी सहायता, फसल बीमा और कर्जमाफी जैसी योजनाओं का लाभ लेने में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जमीन का मालिकाना हक नहीं होने के कारण कई बार वास्तविक रूप से खेती करने वाला व्यक्ति राहत के दायरे से बाहर रह जाता है।
सूखे का असर केवल फसल और रोजगार तक सीमित नहीं है। खेत मजदूरों और बटाईदार परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य खर्च, शादी-विवाह और रोजमर्रा के घरेलू खर्च का संकट भी बढ़ गया है। खेती से आमदनी नहीं होने के कारण परिवार का भरण-पोषण करना चुनौती बन गया है।
सूखा प्रभावित खेत मालिक किसानों के साथ खेत मजदूरों और बटाईदारों को भी राहत देने की मांग जोर पकड़ रही है। मांग है कि सूखा राहत योजनाओं में भूमिहीन मजदूरों और बटाईदार किसानों को भी शामिल किया जाए।
पालकमंत्री और प्रशासन से बटाईदारों के लिए विशेष नीति बनाने, आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की मांग की जा रही है। स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि सूखे से प्रभावित वास्तविक खेती करने वालों तक राहत पहुंचाने के लिए केवल जमीन के मालिकाना हक को आधार न बनाया जाए।