यवतमाल के पांचखेड़ में मिली 3,000 वर्ष पुरानी लौह युगीन मानव बस्ती, नागपुर विवि के उत्खनन में बड़ा खुलासा

Ancient Iron Age: यवतमाल के दिग्रस तहसील के पांचखेड़ में नागपुर विश्वविद्यालय के उत्खनन से 3,000 वर्ष पुरानी लौह युगीन बस्ती के अवशेष मिले हैं, जिससे प्राचीन कृषि व्यवस्था के नए प्रमाण सामने आए हैं।
Ancient Iron Age Settlement Yavatmal
दिग्रस प्राचीन लौह युगीन बस्ती (सोर्स- फोटो नवभारत)
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Ancient Iron Age Settlement Yavatmal: यवतमाल जिले का इतिहास करीब 3 हजार वर्ष पहले समृद्ध कृषि, विकसित बस्ती और उन्नत जीवनशैली का प्रमाण देता है। यवतमाल जिले के दिग्रस तहसील अंतर्गत पांचखेड़ में नागपुर विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा किए गए उत्खनन से लौह युगीन बस्ती के महत्वपूर्ण प्रमाण सामने आए हैं। इस उत्खनन में घरों के अवशेष, लोहे की वस्तुएं, मिट्टी के बर्तन, चावल के दाने और अन्य अनाजों के प्रमाण मिले हैं। इन निष्कर्षों से स्पष्ट हुआ है कि करीब 3 हजार वर्ष पहले इस क्षेत्र में धान, गेहूं, तुअर और मूंग जैसी फसलों की खेती की जाती थी। इस उत्खनन और शोध से एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है कि करीब 3 हजार वर्ष पहले जिले में धान की खेती होती थी।

जलवायु वाला क्षेत्र था यवतमाल

आज कम बारिश वाले क्षेत्र के रूप में पहचाने जाने वाला यवतमाल सातवाहन काल तक नम जलवायु वाला क्षेत्र था। इसके बाद मौसम में आए बदलाव के कारण बारिश कम हुई और खेती की पद्धतियों में भी परिवर्तन आया। उत्खनन में मिले अवशेषों से पता चलता है कि उस समय के लोग खेती के साथ-साथ मछली पकड़ने, शिकार और धातु कार्य में भी निपुण थे। नदी के शंख और सीपियों का उपयोग कर चूना तैयार किए जाने के प्रमाण भी मिले हैं, जो उस समय की विकसित बस्ती का प्रमाण देते हैं।

शोध में मिले प्राचीन बर्तन और अनाज के अवशेष

पांचखेड़ का यह पुरातात्विक शोध केवल यवतमाल ही नहीं, बल्कि विदर्भ के प्राचीन इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अतीत की समृद्ध संस्कृति, कृषि व्यवस्था और पर्यावरण की जानकारी देने वाला यह शोध इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। लगभग 2023 के दौरान नागपुर विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग की ओर से पांचखेड़ गांव के समीप उत्खनन और शोध कार्य शुरू किया गया था। इसके बाद, यहां 3 हजार वर्ष पुरानी लौह युगीन बस्ती, घरों के अवशेष, लोहे और मिट्टी के बर्तन तथा चावल के दाने उत्खनन में मिले।

पुरातत्व विभाग के उत्खनन और शोध से सातवाहन काल में इस क्षेत्र की बस्ती व्यवस्था, खान-पान की आदतें और आत्मनिर्भर गांव की तस्वीर सामने आई है। भले ही वर्तमान में जिले में धान की खेती नहीं होती, लेकिन भूगर्भ और वनस्पति विज्ञान तकनीक से किए गए शोध में सामने आया है कि इस क्षेत्र में गेहूं, धान सहित अन्य फसलों की खेती की जाती थी।

पहले हरा-भरा था यवतमाल

 नागपुर विश्वविद्यालय पुरातत्व विभाग डॉ. प्रभास साहू, प्रमुख न कहा है कि लगभग 3 हजार वर्ष पहले यानी ईसा पूर्व 908 के आसपास के प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं, उस समय इस क्षेत्र में धान की खेती होती थी, इसके स्पष्ट प्रमाण उत्खनन में मिले हैं। शोध के दौरान केवल जंगली नहीं, बल्कि खेती किए गए चावल के प्रमाण भी मिले हैं। इसका अर्थ है कि उस समय यहां का मौसम धान की खेती के लिए अनुकूल था और आज की तुलना में यह क्षेत्र काफी हरा-भरा था।

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