वर्धा में कॉलेजों को नहीं मिल रहे छात्र, प्रवेश प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार से बढ़ी चिंता
Wardha Senior College Admission: वर्धा के कॉलेजों में एडमिशन संकट; 12वीं के रिजल्ट के बाद भी बीए, बीकॉम, बीएससी में सिर्फ 20% प्रवेश। छात्र संख्या घटने से प्रोफेसर गांवों में छात्रों को ढूंढ़ रहे हैं।
- Written By: केतकी मोडक
कॉलेज टीचर प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स - सोशल मिडिया)
BA BCom BSc Admission Decline Wardha: बारहवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित हुए काफी समय बीत चुका है। लेकिन जिले के वरिष्ठ महाविद्यालयों में अभी तक प्रवेश प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाई है। बीए, बीकॉम, बीएससी सहित अन्य स्नातक पाठ्यक्रमों में विद्यार्थियों की संख्या बेहद कम होने से महाविद्यालय प्रशासन और प्राध्यापकों की चिंता बढ़ गई है।
वर्धा शहर सहित जिले के अधिकांश वरिष्ठ महाविद्यालयों में अब तक कुल स्वीकृत क्षमता के मात्र 20 प्रतिशत तक ही प्रवेश हो पाए हैं। प्रवेश की धीमी गति के कारण महाविद्यालयों के प्राध्यापकों को अब विद्यार्थियों की तलाश में गांव-गांव जाकर संपर्क अभियान चलाना पड़ रहा है।
विद्यार्थियों को दे रहे प्रलोभन कई महाविद्यालयों के शिक्षक स्वयं विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों से मिलकर महाविद्यालय की विशेषताओं की जानकारी दे रहे हैं तथा प्रवेश लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इसके साथ ही विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाएं और प्रलोभन भी दिए जा रहे हैं, ताकि प्रवेश संख्या में बढ़ोतरी हो सके।
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शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि विद्यार्थियों की रुचि में बदलाव, व्यावसायिक और कौशल आधारित पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ता झुकाव तथा रोजगारोन्मुखी शिक्षा की मांग के कारण पारंपरिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश कम हो रहे हैं। इसका सीधा असर वरिष्ठ महाविद्यालयों पर पड़ रहा है।
मंडरा रहा दोहरा संकट
प्राध्यापकों का कहना है कि एक ओर नई शिक्षा नीति के कारण नौकरी की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। वहीं दूसरी ओर पर्याप्त संख्या में छात्र नहीं मिलने से स्थिति और गंभीर हो गई है।
ऐसे में उन पर दोहरा संकट मंडरा रहा है। यदि आगामी दिनों में प्रवेश की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं होती है, तो कई महाविद्यालयों के सामने शैक्षणिक और आर्थिक चुनौतियां और अधिक बढ़ सकती हैं, विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि महाविद्यालयों और शिक्षकों के सामने खड़ा यह संकट दूर हो सके।
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शिक्षकों के रोजगार और भविष्य पर प्रभाव
दूसरी ओर, नई शिक्षा नीति (एनईपी) के लागू होने के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में कई प्रकार के संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं। शिक्षकों के कार्यभार, विषयों के पुनर्गठन तथा पदों की उपलब्धता को लेकर पहले से ही अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है।
ऐसे समय में यदि महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार कम होती है। तो इसका प्रभाव शिक्षकों के रोजगार और भविष्य पर भी पड़ सकता है।
