वर्धा: सरकारी कपास खरीद बंद होने से बढ़ी किसानों की मुश्किलें; व्यापारियों को कम दाम में बेचने की मजबूरी

Wardha News: वर्धा जिले में सीसीआई (CCI) द्वारा कपास की सरकारी खरीद बंद होने से किसान संकट में हैं। समर्थन मूल्य न मिलने के कारण अब किसान मजबूरी में कम दामों पर निजी व्यापारियों को कपास बेच रहे हैं।
The closure of government cotton procurement by CCI in Wardha has forced farmers to sell their produce to private traders at lower rates, leading to significant financial losses.
कपास किसान (फोटो-सोर्स,सोशल मीडिया)
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Wardha Farmers Cotton MSP News: वर्धा जिले में सरकारी स्तर पर कपास खरीद बंद होने के बाद किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 'सफेद सोना' कहे जाने वाले कपास को अब किसान मजबूरी में निजी व्यापारियों को बेच रहे हैं, जिससे उनमें नाराजगी का माहौल है। किसानों और जिले की बाजार समितियों के पदाधिकारियों ने शासन से मांग की थी कि समर्थन मूल्य पर कपास खरीद की अंतिम तिथि 31 अप्रैल तक बढ़ाई जाए, लेकिन इस मांग पर ध्यान नहीं दिया गया।

परिणामस्वरूप सरकारी खरीद बंद होते ही किसानों का कपास अब व्यापारियों के घर पहुंचने लगा है। इस वर्ष किसानों को उम्मीद थी कि कपास को अच्छा भाव मिलेगा, लेकिन वास्तविकता में अपेक्षित दर नहीं मिलने से कई किसानों ने कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) के माध्यम से समर्थन मूल्य पर कपास बेचने के लिए पंजीयन कराया। कुछ किसानों ने शुरुआत में ही कम दर पर बिक्री कर दी, जबकि कई किसानों ने बेहतर भाव की उम्मीद में कपास घर पर ही जमा कर रखा।

बड़ी मात्रा में कपास किसानों के पास होने के कारण खरीद अवधि बढ़ाने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। इसके चलते सीसीआई के खरीद केंद्रों को 15 मार्च तक की मोहलत दी गई। हालांकि 27 फरवरी के बाद छुट्टियों को छोड़कर केवल सात दिनों तक ही खरीद हो सकी, जिससे कई किसान अपना कपास केंद्रों तक नहीं पहुंचा पाए।

कई किसानों का कपास घर में

पंजीयन कराने वाले सभी किसानों का कपास खरीदी केंद्रों तक नहीं पहुंच पाया और इसी बीच खरीद प्रक्रिया बंद हो गई, जिससे वर्धा किसानों में असंतोष बढ़ गया है। जिन किसानों ने पंजीयन नहीं कराया था, उनका कपास भी घरों में ही पड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में अब किसानों को मजबूरी में निजी व्यापारियों को लगभग 7,000 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से अच्छा गुणवत्ता वाला कपास बेचना पड़ रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

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