

Karanja Ghadge Tiger Attack: साहस, सूझबूझ और किस्मत ने एक 23 वर्षीय युवा चरवाहे की जान बचा ली। आगरगांव के जंगल में मंगलवार शाम दो वयस्क बाघों ने उस पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन युवक ने पलभर में पास के पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचा ली। लगभग एक घंटे तक दोनों बाघ पेड़ के नीचे डटे रहे। अंततः ग्रामीणों के शोर-शराबे के बाद बाघ जंगल की ओर लौट गए और युवक सुरक्षित नीचे उतर सका।
यह रोमांचक घटना उमेश जनार्दन वरठी (23), निवासी जोगा हेडी के साथ घटी। उमेश रोज की तरह गांव के गजानन आसोले के लगभग 70 मवेशियों को चराने के लिए आगरगांव के जंगल क्षेत्र में गया था। शाम करीब छह बजे अचानक जंगल से दो बड़े पट्टेदार बाघ एक के पीछे एक उसकी ओर बढ़ते दिखाई दिए। बाघों को अपनी ओर आते देख उमेश ने बिना समय गंवाए पास के एक पेड़ पर तेजी से चढ़कर ऊंची शाखा पर शरण ले ली। पेड़ पर चढ़ने के बाद भी खतरा टला नहीं।
दोनों बाघ काफी देर तक पेड़ के नीचे ही डटे रहे और युवक पर नजर बनाए रखी। हालांकि, उन्होंने किसी भी मवेशी पर हमला नहीं किया। घबराए उमेश ने पेड़ पर बैठे-बैठे मोबाइल से मवेशियों के मालिक और अपने एक मित्र को फोन कर घटना की जानकारी दी। उसने बताया कि वह पेड़ पर फंसा हुआ है और नीचे दो बाघ मौजूद हैं। इसी दौरान मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई और उसका संपर्क पूरी तरह टूट गया। इसके बाद करीब एक घंटे तक वह पेड़ पर ही मौत के साए में बैठा रहा।
उमेश के फोन से मिली सूचना के बाद गांव में हड़कंप मच गया। कई ग्रामीण लाठियां लेकर आगरगांव के जंगल की ओर दौड़े और जोर-जोर से आवाजें लगाने लगे। शाम करीब सात बजे जब बाघों ने लोगों की भीड़ और शोर सुना तो दोनों जंगल की ओर भाग निकले। उनके चले जाने की पुष्टि होने के बाद ही उमेश सुरक्षित पेड़ से नीचे उतरा। ग्रामीणों का मानना है कि समय पर मिली मदद और उमेश की सूझबूझ के कारण एक बड़ा हादसा टल गया।
घटना के बाद पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है। स्थानीय नागरिकों ने वन विभाग से जंगल क्षेत्र में तत्काल गश्त बढ़ाने और सुरक्षा के विशेष इंतजाम करने की मांग की है। ग्रामीणों ने बताया कि इसी इलाके में लगभग एक वर्ष पहले भी बाघ के हमले में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है।
उमेश का जीवन शुरू से ही कठिनाइयों से भरा रहा है। जब वह मात्र तीन वर्ष का था, तभी उसके पिता का निधन हो गया। परिवार के पास एक एकड़ जमीन भी नहीं है। आजीविका चलाने के लिए वह वर्षों से दूसरे के मवेशी चराने का काम करता है। वह विवाहित है और उसका एक छोटा बेटा भी है। बाघों से आमना-सामना होने जैसी भयावह घटना के बावजूद परिवार की आर्थिक मजबूरी उसे घर बैठने नहीं देती।
अगले ही दिन वह फिर मवेशी चराने जंगल पहुंच गया, क्योंकि यही उसके परिवार की रोजी-रोटी का एकमात्र साधन है। उमेश की मां ने बताया कि बुढ़ापे का सहारा उनका यही एक बेटा है, इसलिए उसकी चिंता हर समय बनी रहती है। ईश्वर की कृपा और बेटे के साहस ने उसे बाघों के हमले से सुरक्षित बचाया है, जिसके लिए वह भगवान का आभार मानती हैं।