

-राजीत यादव
नवी मुंबई: पारंपरिक खेलों और उद्योगों की तरह ही भारत में अब सर्कस (Circus) भी लुप्त होने की ओर है। साल 2000 में सर्कस में जानवरों का खेल दिखाने पर केंद्र सरकार (Central Government) ने प्रतिबंध (Ban) लगा दिया, जिसकी वजह से लोगों में सर्कस देखने की उत्सुकता लगातार घटी है। साल 2000 के पहले भारत में छोटे-बड़े 150 सर्कस थे, जिसमें से अब सिर्फ 20 सर्कस ही शेष बचे हैं। जिसके मालिक कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। जिसकी वजह से उनके सामने सर्कस को बंद करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इस वजह से अब सर्कस में काम करने वालों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है।
गौरतलब है कि साल 1970 में भारत में सर्कस की शुरुआत महाराष्ट्र में हुई थी, जिसे देखने के लिए देश-विदेश के लोग आया करते थे। धीरे-धीरे सर्कस का खेल देश के विभिन्न राज्यों और विदेशों सर्कस का खेल शुरू करने की होड़ मच गई थी, जिसके चलते देश भर में सर्कस की संख्या 150 हो गई थी। वहीं विदेशों में भी इसकी संख्या हजारों के पार हो गई थी। भारत में आज जहां सर्कस तंबू में दम तोड़ रहा है। वही विदेशों में इसकी धमक कई गुना बढ़ गई है।
19 मई 2000 को तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने सर्कस में जानवरों का खेल दिखाने पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद सरकार ने सर्कस के जानवरों को अपने कब्जे में लेकर विभिन्न राज्यों के जंगलों में छोड़ दिया। तभी से सर्कस का दम घुटने लगा। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से सर्कस के उत्थान के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। जिसकी वजह से अब सर्कस आईसीयू में है, जिसे सर्कस के मालिक अपनी ओर से ऑक्सीजन दे रहे हैं, लेकिन अब आर्थिक तौर से उनकी भी कमर लगभग टूट गई है।
नवी मुंबई के सानपाड़ा में रेंबो इंटरनेशनल सर्कस शुरू हुआ है। जिसके आयोजक विद्याधर तांडेल हैं। इस सर्कस से कलाकारों समेत कुल 275 लोग जुड़े हुए हैं। तांडेल ने बताया कि सर्कस चलाने वालों को केंद्र और राज्य सरकार से किसी प्रकार का अनुदान नहीं मिल रहा है। 1992 में पारित प्रस्ताव के अनुसार सर्कस लगाने के लिए मिलने वाले मैदान के किराया में नाममात्र छूट दी जा रही है, जो ऊंट के मुंह में जीरा के समान हैं। तांडेल ने कहा कि सरकार चाहे तो सर्कस मृत शैया पर जाने से बच सकता है। इसके लिए सरकार को साल 2000 में सर्कस में जानवरों को रखने और उनके खेल पर जो प्रतिबंध सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लगाया गया है, उसके बारे में फिर से विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखना होगा।