

वर्ष 2009 में शुरू हुई योजना के तहत 115 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और सीवर नेटवर्क विकसित करने की योजना थी।
सीवेज डिस्पोजल टैक्स के रूप में 1,500 करोड़ रुपये से अधिक वसूले जाने का दावा किया गया है।
पहले भौगोलिक परिस्थितियों के कारण मुश्किल बताए गए इलाकों में दूसरे चरण के तहत काम करने की योजना पर विपक्ष ने स्पष्टीकरण मांगा है।
Underground Sewerage Second Phase: ठाणे शहर में भूमिगत सीवर योजना का पहला चरण करीब 18 साल बाद भी अधूरा है। इस पर लगभग 800 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद महज 15 प्रतिशत सोसायटियां ही योजना से जुड़ पाई हैं।
इसके बावजूद अब दूसरे चरण की 476 करोड़ रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) को महासभा में मंजूरी दे दी गई है। सत्ताधारी भाजपा के इस फैसले का विपक्ष ने विरोध करते हुए पुराने प्रोजेक्ट को पूरा किए बिना नई योजना पर खर्च करने को जनता के पैसे की बर्बादी बताया।
शहर का सीवेज पहले बिना ट्रीटमेंट के सीधे खाड़ी में छोड़ा जाता था। इसे रोकने के लिए 2009 में भूमिगत सीवर योजना के पहले चरण का काम शुरू हुआ। इसके तहत सृष्टि, शांतिनगर सहित ठाणे शहर के विभिन्न इलाकों में 10 स्थानों पर कुल 115 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित कर उन्हें सीवर नेटवर्क से जोड़ने की योजना थी।
लेकिन 18 साल बाद भी काम अधूरा है और संबंधित इलाकों के सभी नागरिकों को इसका लाभ नहीं मिल पाया है। आरोप है कि कई सीवेज प्रोसेसिंग प्लांट बंद होने के बावजूद उनके रखरखाव और मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
वहीं, सीवेज डिस्पोजल टैक्स के रूप में पिछले कुछ वर्षों में 1,500 करोड़ रुपये से अधिक वसूले जाने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में योजना की उपयोगिता, खर्च और अधूरे काम को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
दूसरे चरण की 476 करोड़ रुपये की DPR पिछले सप्ताह हुई महासभा में मंजूरी के लिए पेश की गई। विपक्षी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना ने विरोध प्रस्ताव रखते हुए कहा कि पहले चरण का काम पूरा नहीं हुआ है और दूसरे चरण की पूरी जानकारी भी विपक्ष को नहीं दी गई।
ऐसे में नई योजना को मंजूरी देना उचित नहीं है। हालांकि, सदन में बहुमत नहीं होने के कारण विपक्ष का प्रस्ताव खारिज हो गया और सत्ताधारी भाजपा की ओर से दूसरे चरण को मंजूरी मिल गई।
विपक्ष ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं। पहले चरण के दौरान प्रशासन ने भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देते हुए राई, मुर्धा सहित कुछ इलाकों में सीवर योजना लागू करना मुश्किल बताया था।
अब दूसरे चरण में इन्हीं इलाकों में योजना लागू करने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब भौगोलिक परिस्थितियां पहले बाधा थीं, तो अब उनमें ऐसा क्या बदलाव आया है कि वहां योजना लागू करना संभव हो गया है?