प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स: सोशल मीडिया)
Thane Court Verdict In 2002 Train Loot Case: महाराष्ट्र के ठाणे जिले से न्याय व्यवस्था की कछुआ चाल और पुलिस की ढुलमुल कार्यप्रणाली का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। कल्याण की एक अतिरिक्त सत्र अदालत ने साल 2002 के ट्रेन लूटपाट मामले में दो आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि पिछले 22 सालों में अभियोजन पक्ष (Prosecution) अदालत के सामने एक भी महत्वपूर्ण गवाह पेश करने में विफल रहा।
घटना 24 जुलाई, 2002 की है। अभियोजन पक्ष के दावों के अनुसार, आरोपियों ने कल्याण स्टेशन के पास चलती चालुक्य एक्सप्रेस में एक महिला यात्री को अपना निशाना बनाया था और उससे लूटपाट की थी। इस मामले में पुलिस ने शेख बाबू उर्फ छोटा बाबू शेख प्यारे और शेख अयूब शेख यूसुफ को आरोपी बनाया था।
कल्याण के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पी आर अष्टुरकर ने 9 फरवरी को दिए अपने फैसले में (जिसकी प्रति हाल ही में उपलब्ध हुई) स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो आरोपियों की संलिप्तता की ओर इशारा करता हो। जज ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस मामले में आरोपियों की सक्रिय भागीदारी का दूर-दूर तक संकेत देता हो।
इस केस की सबसे कमजोर कड़ी यह रही कि दो दशकों के लंबे इंतजार के बावजूद पुलिस किसी भी गवाह का पता नहीं लगा सकी। अदालत ने अपने आदेश में दर्ज किया कि बार-बार प्रयास और समन भेजने के बाद भी अभियोजन पक्ष किसी भी चश्मदीद या पीड़ित को जिरह के लिए नहीं ला पाया। पूरे मामले में केवल एक गवाह का बयान दर्ज हुआ, और वह था ‘समन’ तामील करने वाला पुलिस कांस्टेबल। उस कांस्टेबल ने भी कोर्ट में यह स्वीकार किया कि गवाहों का पता नहीं लगाया जा सका है।
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अदालत ने अंततः यह माना कि जब कोई ठोस गवाह या सबूत मौजूद ही नहीं है, तो मामले को बेवजह लटकाए रखना समय की बर्बादी है। आरोपियों के खिलाफ कोई भी साक्ष्य न मिलने के कारण उन्हें बरी कर दिया गया। यह मामला हमारी न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाले लंबे समय और जांच एजेंसियों की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।