क्या सिर्फ बात न मानने पर जा सकती है नौकरी? सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी की अर्जी पर सुनाया बड़ा फैसला

Employee Termination Rules: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि सिर्फ अनुशासनहीनता या आदेश न मानने पर किसी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। यह सजा केवल गंभीर मामलों में दी जानी चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Supreme Court Judgment On Employee Termination: देश की सर्वोच्च अदालत ने कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी पुराने कर्मचारी को सिर्फ अनुशासनहीनता, हुक्म न मानने या आदेश की नाफरमानी करने के लिए नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। नौकरी से निकालने जैसी कठोर सजा सिर्फ भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण या कंपनी को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर मामलों में ही दी जानी चाहिए। ये बात जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने महाराष्ट्र से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कही है।

सुप्रीम कोर्ट ने नौकरी से निकाले जाने पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम काम की जगह पर अनुशासन के महत्व को कम नहीं आंक रहे हैं। लेकिन भ्रष्टाचार, गैर-कानूनी तरीके से पैसे लेना,फंड का गलत इस्तेमाल, एम्प्लॉयर को साबित नुकसान, अनैतिक आचरण या संगठन की बदनामी करने वाले व्यवहार के बिना किसी भी कर्मचारी को नौकरी से निकालने जैसी कठाेर सजा नहीं दी जा सकती।

महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड से जुड़ा है मामला

यह मामला महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) के एक कर्मचारी से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित कर्मचारी को साल 2017 में नौकरी से निकालने के आदेश को रद्द कर दिया। इस दौरान कोर्ट ने महत्वपूर्ण पहलू पर रोशनी डालते हुए कहा कि नौकरी से निकालने का मतलब है कि कर्मचारी और मालिक का रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। इतना ही नहीं, इससे कर्मचारी अपने जीवनभर की कमाई यानी रिटायरमेंट के फायदों से भी वंचित हो जाता है, जो उसके बुढ़ापे का सहारा होते हैं।

नौकरी जाने से कर्मचारी के परिवार पर भी पड़ता है असर

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि कर्मचारी नौकरी से निकाले जाने न सिर्फ उसके कमाई का जरिया खत्म होता है, बल्कि उसके परिवार के सदस्यों को भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जस्टिस एनके सिंह ने कहा कि नौकरी से निकाले जाने पर व्यक्ति के सर्विस रिकॉर्ड पर हमेशा के लिए दाग लग जाता है और इससे भविष्य में नौकरी मिलने की संभावनाओं पर गलत असर पड़ सकता है। खासकर सरकारी नौकरी, वैधानिक निकायों, पब्लिक सेक्टर और दूसरे संस्थानों में जहां पिछले रिकॉर्ड और सर्विस रिकॉर्ड मायने रखते हैं।

21 साल की सेवा को देखते हुए पुनर्विचार के निर्देश

इस मामले में संबंधित कर्मचारी ने संस्थान को 21 साल की लंबी सेवाएं दी थीं और अब वह रिटायरमेंट की उम्र भी पार कर चुका है। कर्मचारी की इस लंबी सेवा को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे कथित अनुशासनहीनता, हुक्म न मानने और सरकारी दस्तावेजों को नष्ट करने के आरोपों के बदले दी जाने वाली सजा के स्वरूप पर फिर से विचार करें और कोई नरम रुख अपनाएं।