प्याज की खेती में आंसुओं का सैलाब, 4 महीनों में ₹400 करोड़ स्वाहा, ₹1 किलो के भाव ने तोड़ी किसानों की कमर
Solapur APMC Onion Prices: महाराष्ट्र में प्याज किसानों पर गहराया आर्थिक संकट। सोलापुर मंडी में ₹1 किलो तक गिरे दाम। 4 महीनों में ₹400 करोड़ का नुकसान। जानें क्या हैं मुख्य कारण।
- Written By: गोरक्ष पोफली
किसान की फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Onion Farmers Loss: देश के प्याज भंडार कहे जाने वाले महाराष्ट्र से एक ऐसी हृदयविदारक तस्वीर सामने आ रही है, जिसने अन्नदाता को दाने-दाने को मोहताज कर दिया है। पिछले चार महीनों से प्याज की गिरती कीमतों ने किसानों को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहाँ फसल को बाजार तक ले जाने का भाड़ा निकालना भी दूभर हो गया है। हाल ही में सोलापुर कृषि उपज मंडी समिति में प्याज का भाव गिरकर महज ₹100 प्रति क्विंटल (यानी ₹1 प्रति किलो) रह गया, जो इस साल का सबसे निचला और शर्मनाक स्तर है।
किसानों के श्रम का मोल शून्य
कृषि विशेषज्ञों और बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि पिछले मात्र 120 दिनों के भीतर प्याज उत्पादकों की लगभग ₹395 करोड़ से ₹400 करोड़ की जमा-पूंजी बाजार की बेरुखी की भेंट चढ़ चुकी है। सबसे डरावना तथ्य यह है कि इस घाटे के आकलन में किसानों और उनके परिवारों द्वारा खेतों में बहाए गए पसीने और दिन-रात की मेहनत को जोड़ा ही नहीं गया है। यदि किसान की मजदूरी भी जोड़ी जाए, तो यह आंकड़ा कहीं अधिक भयावह होगा।
लागत और कमाई का घातक अंतर
आज के दौर में प्याज उगाना एक ऐसा जुआ बन गया है जिसमें किसान का हारना तय दिख रहा है। महंगाई की मार ने खेती के समीकरण बदल दिए हैं, बीजों की बढ़ती कीमतें, महंगी मजदूरी, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के महंगे दाम के साथ-साथ बेमौसम बारिश ने प्याज की उत्पादन लागत को ₹18 प्रति किलो के स्तर पर पहुंचा दिया है। इसके विपरीत, मंडियों में किसानों को औसतन केवल ₹6 प्रति किलो का भाव मिल रहा है। किसान को हर एक किलो प्याज बेचने पर ₹10 से ₹12 का सीधा घाटा हो रहा है। यानी जितनी अधिक पैदावार, उतना ही बड़ा आर्थिक बोझ।
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सरकारी नीतियों के खिलाफ सुलगता आक्रोश
किसान इस तबाही के लिए सीधे तौर पर सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। रबी सीजन की शुरुआत से ही प्याज के भाव उत्पादन लागत से काफी नीचे बने हुए हैं। किसानों का मानना है कि निर्यात बंदी और केवल उपभोक्ताओं को खुश रखने वाली सस्ता राशन नीति ने उत्पादकों के हितों की बलि दे दी है।
वर्तमान में किसान सरकार से बड़े वित्तीय पैकेज और अनुदान की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस आश्वासन न मिलने के कारण ग्रामीण इलाकों में भारी नाराजगी और बेचैनी का माहौल है। यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो यह आर्थिक संकट एक बड़े सामाजिक संकट में बदल सकता है।
