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शिवसेना शिंदे के पास कैसे चली गई? सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में तीखा हमला; चुनाव आयोग पर ही सवाल उठाए

Shiv Sena Supreme Court Hearing: सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना सिंबल विवाद की अंतिम सुनवाई में उद्धव गुट के वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल उठाते हुए शिंदे गुट पर तीखे हमले किए।

  • Written By: आकाश मसने
Updated On: Aug 06, 2026 | 05:51 PM

कपिल सिब्बल व एकनाथ शिंदे (डिजाइन फोटो, सोर्स: AI)

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Kapil Sibal Arguments On Shiv Sena Symbol Case: महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की बगावत और उसके बाद शिवसेना में हुई ऐतिहासिक टूट का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने शीर्ष अदालत में जोरदार बहस की। सिब्बल ने चुनाव आयोग (ECI) के फैसले और महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के रुख पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए पूछा कि क्या चुनाव आयोग को पार्टी के संविधान को अमान्य करने का अधिकार था?

सुप्रीम कोर्ट में क्या बाेले कपिल सिब्बल?

सुप्रीम कोर्ट में तर्क देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि सत्ता में बैठे लोग चुंबक की तरह काम करते हैं। बगावत के वक्त शिंदे के साथ केवल 16 विधायक थे, जो धीरे-धीरे बढ़कर 31, फिर 39 और अंत में 56 हो गए। सिब्बल ने आरोप लगाया कि सत्ता का इस्तेमाल करके विधायकों और सांसदों को अपने साथ जोड़ा गया। इसके बाद एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने। सिब्बल ने कहा कि यह सब चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दिए गए गलत निर्णयों के आधार पर हुआ।

एकनाथ शिंदे के पार्टी से अलग होने से पहले ही शिवसेना का संविधान लागू था, फिर भी चुनाव आयोग ने उस संविधान को खारिज कर दिया। लेकिन, क्या चुनाव आयोग के पास उसे खारिज करने का अधिकार था? ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिबल ने सुप्रीम कोर्ट में यह अहम सवाल उठाया।

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एकनाथ शिंदे ने उस पार्टी संविधान को मानने से इनकार कर दिया जो उद्धव ठाकरे के नेता रहते हुए लागू था। इस पर कपिल सिब्बल ने सवाल उठाते हुए पूछा कि कोई व्यक्ति उसी पार्टी संविधान को कैसे खारिज कर सकता है जिसके तहत वह विधायक या मंत्री बना था?

क्या विधानसभा में हुई फूट को राजनीतिक फूट माना जाना चाहिए?

कपिल सिबल ने यह भी सवाल उठाया कि एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद, विधानसभा अध्यक्ष ने इस आधार पर फैसला सुनाया कि कुछ विधायक उनके साथ हो गए थे। लेकिन क्या विधानसभा के भीतर हुई फूट को राजनीतिक फूट माना जाना चाहिए?

एकनाथ शिंदे के बगावत करने के बाद शिवसेना में फूट पड़ गई। इसके बाद, चुनाव आयोग ने फैसला सुनाया कि एकनाथ शिंदे का गुट ही ‘असली’ शिवसेना है। ठाकरे गुट ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, और अब इस मामले की सुनवाई अपने आखिरी दौर में है।

शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सिब्बल ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) का हवाला देते हुए शिंदे गुट के विधायकों को अपात्र ठहराने की मांग की। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि इस बात को अब दो साल से ज्यादा हो चुके हैं, उस विधानसभा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है, तो अब विधायकों की अपात्रता पर बहस का क्या औचित्य है?

इस पर कपिल सिब्बल ने स्पष्ट किया कि उस फैसले का असर आगे की पूरी प्रक्रिया पर पड़ा, क्योंकि उसी आधार पर पार्टी का नाम और ‘धनुष-बाण’ का प्रतीक चिन्ह शिंदे गुट को सौंपा गया।

यह भी पढ़ें:- CJP में बगावत! अभिजीत दिपके के घर के बाहर कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन, कोर कमेटी में भाई-भतीजावाद का आरोप

सुप्रीम कोर्ट में कानूनी दांव-पेच जारी

शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने ‘सादिक अली केस’ और ‘सुभाष देसाई केस’ का संदर्भ देते हुए कहा कि विधायक दल और मूल राजनीतिक दल का संबंध अलग होता है। अपात्रता की जांच एक अलग प्रक्रिया है। वहीं, कपिल सिब्बल ने कहा कि अयोग्य ठहराए जाने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही आयोग द्वारा फैसला सुनाए जाने से यह पेच फंसा है। फिलहाल मामले पर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी दांव-पेच जारी हैं।

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Published On: Aug 06, 2026 | 05:34 PM

Topics:  

  • Eknath Shinde
  • Kapil Sibal
  • Shiv Sena
  • Shiv Sena UBT
  • Supreme Court
  • Uddhav Thackeray

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