पश्चिमी घाट और कोंकण में विकास बनाम पर्यावरण की जंग, हाईवे-पोर्ट और रिफाइनरी से किस पर मंडरा रहा संकट?

Maharashtra Western Ghats Environmental Issues: पश्चिमी घाट और कोंकण में कर्जत हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट, वढवण पोर्ट, बारसू रिफाइनरी और ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे को लेकर पर्यावरण और आजीविका पर बहस तेज है।
Environmental impact of infrastructure projects in Konkan
पश्चिमी घाट क्षेत्र की सांकेतिक फोटो(सोर्स: सोशल मीडिया)
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Highlights

  • पश्चिमी घाट क्षेत्र में विकास परियोजनाओं से रोजगार और सुविधाएं बढ़ने की उम्मीदें हैं।

  • पर्यावरण और स्थानीय लोगों की आजीविका की अनदेखी मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

  • विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाने के लिए सही कदम जरूरी हैं।

Maharashtra Western Ghats Conservation 2026: महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट और कोंकण में विकास की रफ्तार तेज करने के लिए कई बड़ी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। कहीं 3,000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई का मामला है, तो कहीं समुद्र में पोर्ट बनाने और तटीय इलाकों में रिफाइनरी स्थापित करने की योजना। इन परियोजनाओं से रोजगार, परिवहन और औद्योगिक विकास की उम्मीदें जुड़ी हैं, लेकिन दूसरी ओर स्थानीय मछुआरों, किसानों, आदिवासियों और पर्यावरण संगठनों की चिंताएं भी बढ़ रही हैं।

इसी बीच केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में पश्चिमी घाट के 56,825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को इको-सेंसिटिव एरिया घोषित करने के लिए सातवीं ड्राफ्ट अधिसूचना जारी की। इस बहस को नई प्रासंगिकता मिली है, खासकर तब जब पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए लंबे समय तक आवाज उठाने वाले पर्यावरणविद् प्रो. माधव गाडगिल का जनवरी 2026 में निधन हो गया।

सवाल अब भी वही है क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच कोई ऐसा रास्ता निकल सकता है, जिसमें अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़े और प्रकृति व स्थानीय समुदायों की कीमत पर प्रगति न हो?

मॉनसून के बाद भूस्खलन का खौफ

पश्चिमी घाट में बदलती जलवायु के कारण मूसलाधार बारिश और कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं। लेकिन यह भूस्खलन सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम है।

सड़कों और रिज़ॉर्ट्स के लिए पहाड़ियों की अनियोजित सीधी कटाई, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बंद करने तथा गहरे जड़ों वाले प्राकृतिक जंगलों को हटाकर उथली जड़ों वाले व्यावसायिक पेड़ लगाने से मिट्टी की पकड़ खत्म हो चुकी है। बारिश के बाद पहाड़ों का दरकना और गांव के गाँव बह जाना इसी पारिस्थितिक असंतुलन की देन है।

कर्जत हाइड्रोपावर और कोंकण एक्सप्रेसवे

महाराष्ट्र में विकास परियोजनाओं के नाम पर प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ हो रही है। रायगढ़ जिले के कर्जत में टॉरेंट पावर की 3,000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना के लिए 32,000 से अधिक पेड़ काटे जाने का विरोध हो रहा है। पर्यावरण संगठन वनशक्ति के अनुसार प्रभावित 6 में से 3 गांव (धाक, पोतल और साईडोंगर) पश्चिमी घाट के प्रस्तावित इको-सेंसिटिव एरिया में आते हैं।

वहीं, पनवेल से महाराष्ट्र-गोवा सीमा तक प्रस्तावित 389 किमी लंबे 6-लेन एक्सप्रेसवे के रूट में बदलाव किया जा रहा है ताकि इसे पश्चिमी घाट के इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) से बाहर रखा जा सके। इसमें 41 सुरंगें और 21 बड़े पुल प्रस्तावित हैं।

वाढवण पोर्ट और बारसू रिफाइनरी का जन-आक्रोश

स्थानीय मछुआरों, आदिवासियों और किसानों की रोजी-रोटी छीनने वाले मेगा प्रोजेक्ट्स के खिलाफ 2026 में जन-आंदोलन तेज हो गया है। पालघर में प्रस्तावित वाढवण पोर्ट के खिलाफ हजारों मछुआरों, आदिवासियों और महिलाओं ने कलेक्टर कार्यालय तक विशाल विरोध मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि समुद्र में पोर्ट और औद्योगिक पार्कों के निर्माण से उनके मछली पकड़ने के पारंपरिक क्षेत्र नष्ट हो जाएंगे।

रत्नागिरी के बारसू-सोलगांव में ₹3 लाख करोड़ की लागत से दुनिया की सबसे बड़ी पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी का अल्फ़ान्सो आम उत्पादक और मछुआरे उग्र विरोध कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से न केवल अल्फ़ान्सो आम के उपजाऊ बागानों और तटीय मछुआरों को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि यूनेस्को की संभावित सूची में शामिल हजारों साल पुराने चट्टानी नक्काशी भी नष्ट होने की कगार पर हैं।

मुंबई कोस्टल रोड के लिए समुद्र के भराव से हाजी अली और वर्ली के पारंपरिक मछुआरों के नाव पार्किंग व जाल सुखाने की जगह छिन गई तथा उनकी आय में 50% की गिरावट आई, जिसके बाद TISS की रिपोर्ट के आधार पर 1,343 प्रभावितों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

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पर्यावरण नीति पर राजनीतिक गतिरोध

भारत सरकार द्वारा पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए जारी 7वीं प्रारूप अधिसूचना 2026 में भी राज्यों की आपत्तियों के कारण अधर में लटकी हुई है। प्रस्तावित इको-सेंसिटिव एरिया (ESA) 6 राज्यों के 56,825.7 वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करता है। जहां गाडगिल समिति (2011) ने संपूर्ण पश्चिमी घाट को संरक्षित करने का सुझाव दिया था, वहीं कस्तूरीरंगन समिति (2013) ने संतुलन बनाते हुए केवल 37% (लगभग 60,000 वर्ग किमी) क्षेत्र को संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी।

इसके बावजूद, वाणिज्यिक खनन, नए ताप विद्युत संयंत्रों और लाल श्रेणी के उद्योगों पर रोक के डर से राज्य सरकारें इसे लागू करने से कतरा रही हैं।

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विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती

पश्चिमी घाट और कोंकण में विकास जरूरी है, लेकिन इसके लिए जंगलों, समुद्र और वहां रहने वाले लोगों की आजीविका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार के सामने चुनौती यही है कि बड़ी परियोजनाओं से रोजगार और सुविधाएं बढ़ें, साथ ही पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचे।

स्थानीय लोगों की चिंताओं को सुने बिना लिए गए फैसले आने वाले समय में बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। अब देखना होगा कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।