नोटा बटन (सौ. सोशल मीडिया )
Pune News In Hindi: राज्य की विभिन्न नगर पालिका में इस बार अभूतपूर्व स्तर पर निर्विरोध चुनाव हो रहे हैं। राजनीतिक दलों और कई निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा विभिन्न कारणों से नामांकन वापस लिए जाने के कारण, सत्ताधारी दलों के अनेक उम्मीदवार मतदान से पूर्व ही निर्वाचित घोषित कर दिए गए हैं।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इस घटनाक्रम पर रिपोर्ट तलब की है, लेकिन लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले नागरिकों और संगठनों ने इस प्रवृत्ति पर तीखी नाराजगी व्यक्त की है।
सोशल मीडिया पर यह प्रश्न भी चर्चा का विषय बना हुआ है कि जब ‘नोटा’ (NOTA) का विकल्प मतपत्र से हटाया नहीं गया है, तो चुनाव निविरोध कैसे घोषित किया जा सकता है?
इसी पृष्ठभूमि में ‘नोटा’ की संवैधानिक वैधता, संबंधित कानूनों और नोटा को मिलने वाले मतों के भविष्य पर संविधान विशेषज्ञ उल्हास बापट ने महत्वपूर्ण निरीक्षण साझा किए हैं। उल्हास बापट ने कहा, “मैं पिछले 50 वर्षों से संविधान का विद्यार्थी और अध्यापक रहा हूँ, लेकिन अपने जीवन में इतनी बड़ी संख्या में निर्विरोध चुनाव कभी नहीं देखे।
यह केवल एक सतही भी निर्विरोध जीत का सिलसिला जारी है। लक्षण नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुछ गंभीर संकेत छिपे हो सकते हैं।” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “जैसे किसी व्यक्ति का अचानक वजन कम होना मात्र एक लक्षण होता है, लेकिन उसके भीतर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। उसी तरह, हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था किस ‘बीमारी’ से ग्रस्त हो रही है।
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नोटा विकल्प पर टिप्पणी करते हुए बाघट ने कहा कि जिस प्रकार चुनाव लड़ने और नामाकन वाप्स लेने का अधिकार उम्मीदवारों को है, उसी तरह मतदान करने या न करने (अस्वीकार करने) का अधिकार मतदाता को है। इसी का नाम नोटा है। उन्होंने स्पष्ट किया, लेकिन वास्तविकता में संवैधानिक शक्तियों के अभाव के कारण नोटा एक ‘बिना दांत का शेर’ बनकर रह गया है। राज्य में नगरपालिका चुनावों के बाद अब मनपा चुनावों में भी निविरोध जीत का सिलसिला जारी है।