Maharashtra की नदियों में खतरे की घंटी, Mumbai-Pune की नदियां ‘गंभीर रूप से प्रदूषित

CPCB की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र के मुख्य शहरों Pune, Mumbai और Solapur से गुजरने वाली नदियां अब गंभीर रूप से प्रदूषित नदियों की कैटेगरी में शामिल हो गई है।
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पवना नदी (सौ. सोशल मीडिया )
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Pune News In Hindi: महाराष्ट्र की प्रमुख नदियां गंभीर प्रदूषण संकट का सामना कर रही हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के प्रमुख शहरों पुणे, मुंबई और सोलापुर से गुजरने वाली नदियां अब 'गंभीर रूप से प्रदूषित' की श्रेणी में आ गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इन नदियों का पानी न पीने लायक बचेगा, न खेती के काम आ सकेगा।

पुणे की नदियों में बह रहा सीवेज

पुणे की मुला, मुठा और पवना नदियां शहरी सीवेज और कचरे की वजह से तेजी से प्रदूषित हो रही हैं। पुणे महानगर पालिका (पीएमसी) क्षेत्र में हर दिन करीब 980 करोड़ लीटर सीवेज उत्पन्न होता है, लेकिन शोधन की क्षमता केवल 477 करोड़ लीटर की ही है। बाकी गंदा पानी सीधे नदियों में छोड़ा जा रहा है, जिससे न केवल जल गुणवत्ता गिरी है, बल्कि जैव विविधता भी खतरे में पड़ गई है।

मुंबई और सोलापुर की स्थिति भी चिंताजनक

  • राजधानी मुंबई की मीठी नदी और ठाणे क्षेत्र की कालू नदी भी अत्यंत प्रदूषित हो चुकी हैं, रोजाना इन नदियों में भारी मात्रा में औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू गंदगी डाली जा रही है।
  • वहीं, सोलापुर की भीमा नदी कृषि रसायनों और औद्योगिक अपशिष्ट के कारण संकटग्रस्त मानी जा रही है। इस प्रदूषण से न केवल पानी जहरीला हो रहा है, बल्कि इससे लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। नदी के पानी में प्रदूषण मापने का एक महत्वपूर्ण मानक है बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD)।
  • सुरक्षित सीमा 3 मिलीग्राम प्रति लीटर मानी जाती है, लेकिन पुणे की नदियों में यह स्तर 30 मिलीग्राम प्रति लीटर से ऊपर तक पहुंच चुका है। इसका अर्थ है कि पानी में घुली ऑक्सीजन बेहद कम है, जिससे जलीय जीव-जंतुओं का जीवन संकट में है।
  • विशेषज्ञों का कहना है कि अनियोजित शहरीकरण और कमजोर पर्यावरणीय निगरानी इस संकट के मुख्य कारण हैं। तेजी से बनते नए हाउसिंग प्रोजेक्ट तो नजर आ रही हैं, लेकिन उनके लिए जरूरी शोधन संयंत्र और अपशिष्ट प्रबंधन योजनाएं अभी भी अधूरी हैं।

चेतावनी नहीं, अलार्म है यह रिपोर्ट

नदियां सिर्फ जल स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का आधार हैं। लेकिन आज वे स्वयं बीमार हो चुकी हैं। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो महाराष्ट्र की नदियां पीने के पानी, सिंचाई और पर्यावरण के लिए अभिशाप बन सकती हैं। सीपीसीबी की रिपोर्ट केवल चेतावनी नहीं, बल्कि एक अलार्म है। समय रहते जागना होगा। सरकार, स्थानीय निकायों और आम जनता को मिलकर ही इन जीवनदायिनी नदियों को बचाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

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