Pune Zila Parishad Elections में वंशवाद हावी, दिग्गज नेताओं के रिश्तेदारों की एंट्री
करीब नौ साल बाद हो रहे Pune ZP चुनावों में विकास से ज्यादा वंशवाद चर्चा में है। प्रमुख दलों ने मंत्रियों, विधायकों और पूर्व नेताओं के 35 से अधिक रिश्तेदारों को टिकट देकर सियासी हलचल बढ़ा दी है।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे जिला परिषद (सौ. सोशल मीडिया )
Pune News In Hindi: करीब नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पुणे जिला परिषद और पंचायत समिति के चुनावों की घोषणा ने जिले की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। हालांकि इस बार चुनावी माहौल विकास योजनाओं से ज्यादा ‘घरानेशाही’ यानी वंशवाद के मुद्दे के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ नजर आ रहा है।
प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए पुराने और प्रभावशाली नेताओं के परिवारों पर भरोसा जताया है। अनुमान है कि करीब 35 से ज्यादा रिश्तेदार-मंत्रियों के बेटे, पूर्व विधायकों की पत्नियां, भतीजे और पुत्र-इस बार जिला परिषद की राजनीति में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
अजित पवार गुट की रणनीति
उपमुख्यमंत्री अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने इंदापुर क्षेत्र से कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे के पुत्र श्रीराज भरणे को मैदान में उतारकर साफ संकेत दे दिया है कि पार्टी अनुभव और पारिवारिक पकड़ को प्राथमिकता दे रही है।
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शरद पवार गुट भी पीछे नहीं
शरद पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस ने भी इसी रणनीति को अपनाया है। पार्टी ने पूर्व विधायक अशोक पवार की पत्नी सुजाता पवार को टिकट देकर क्षेत्र में मजबूत पारिवारिक आधार पर भरोसा जताया है।
अन्य प्रमुख पारिवारिक चेहरे
इसके अलावा विधायक दिलीप वलसे पाटिल के भतीजे विवेक वलसे-पाटिल और पूर्व विधायक पोपटराव गावडे के पुत्र राजेंद्र गावडे जैसे नाम भी चुनावी मैदान में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। कई दिवंगत नेताओं के परिवारों को भी टिकट देकर दलों ने राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना है।
विकास बनाम विरासत की बहस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दल सुरक्षित और पहचाने हुए चेहरों पर दांव लगाकर जोखिम कम करना चाहते हैं। हालांकि इससे स्थानीय स्तर पर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं।
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चुनाव नतीजों पर टिकी निगाहें
अब देखना होगा कि मतदाता इस ‘घरानेशाही’ को स्वीकार करते हैं या नई सोच और नए चेहरों को मौका देकर पुणे की ग्रामीण राजनीति को नई दिशा देते हैं।
