

मूला-मुठा नदी के प्रदूषण से सूक्ष्मजीव विविधता प्रभावित, आघारकर संस्थान के अध्ययन में खुलासा।
17 स्थानों के नमूनों में संवेदनशील प्रजातियां घटीं, प्रदूषण सहने वाली प्रजातियां बढ़ीं।
जैवविविधता बचाने के लिए गंदे पानी का शोधन और प्रदूषण नियंत्रण जरूरी।
Pune Mula Mutha River Pollution: पुणे शहर के अपशिष्ट जल और प्रदूषण ने मूला-मुठा नदी की सूक्ष्मजीव विविधता को बदल दिया है। हैरानी की बात यह है कि मानसून में नदी का प्रवाह बढ़ने और गंदगी के बह जाने के बावजूद सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक संरचना पहले जैसी नहीं हो रही है।
पुणे स्थित आघारकर अनुसंधान संस्थान के अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है। शोध के अनुसार, नदी में प्रदूषण का स्तर ही तय कर रहा है कि कौन-सी प्रजातियां टिकेंगी और कौन-सी धीरे-धीरे खत्म होंगी।
शोधकर्ता प्रत्याशा नायक और डॉ. बालासुब्रमणियन कार्तिक ने वर्ष 2022 और 2023 के दौरान नदी के उद्म क्षेत्र से लेकर शहरी और औद्योगिक इलाकों तक 17 स्थानों से पानी और पत्थरों पर
जमा जैविक परत के नमूने एकत्र किए। इन नमूनों में 'डायटम्स' नामक एक कोशिकीय सूक्ष्म शैवाल का अध्ययन किया गया। डायटम्स की कोशिकाओं के चारों ओर सिलिका का कवच होता है। पर्यावरण में होने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील होने के कारण इनका उपयोग पानी की गुणवत्ता और प्रदूषण के प्रभावों का आकलन करने में किया जाता है।
अध्ययन में पाया गया कि नदी के किसी एक स्थान पर अलग-अलग मौसमों में डायटम्स की कुल विविधता अपेक्षाकृत स्थिर रह सकती है। हालांकि, उगम क्षेत्र से शहरी हिस्सों की ओर बढ़ने पर इनकी प्रजातियों की संरचना में बड़ा बदलाव दिखाई दिया। पश्चिमी घाट के उद्गम क्षेत्र में स्वच्छ पानी और घुलित
ऑक्सीजन की अधिक उपलब्धता के कारण स्थानीय प्रजातियां पाई गई। इसके विपरीत, शहरी क्षेत्रों में सांडपानी और पोषक तत्वों की बढ़ती मात्रा के साथ प्रदूषण के प्रति संवेदनशील प्रजातियां कम हुई, जबकि पुणे शहर प्रदूषण सहन करने वाली प्रजातियों का अनुपात बढ़ गया।
शोध में पानी की विद्युत चालकता और घुलित ऑक्सीजन को सूक्ष्मजीवों की संरचना प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में पहचाना गया। पानी में घुले लवणों की मात्रा बढ़ने से विद्युत चालकता बढ़ सकती है, जबकि सांडपानी पानी में ऑक्सीजन के स्तर को प्रभावित कर सकता है। इससे संवेदनशील स्थानीय प्रजातियों के अस्तित्व पर असर पड़ता है।
अध्ययन के बाद कहा गया कि नदी के संरक्षण के लिए केवल प्राकृतिक प्रवाह बनाए रखना पर्याप्त नहीं है। दूषित या गंदे पानी का उचित शोधन, प्रदूषकों पर नियंत्रण और जल गुणवत्ता के मानकों का प्रभावी पालन भी जरूरी है। मानसून में तेज प्रवाह के बावजूद सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक संरचना बहाल नहीं होना बताता है कि मूला-मुठा नदी की जैवविविधता बचाने के लिए प्रदूषण नियंत्रण को प्राथमिकता देनी होगी।