पुणे में बढ़ी उमस भरी गर्मी, कई इलाकों में तापमान 38°C तक पहुंचा
Pune Weather Update: पुणे में इन दिनों गर्मी और उमस का असर तेजी से बढ़ रहा है, जहां कई क्षेत्रों में तापमान 38 डिग्री तक पहुंच गया है। IITM और बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय ने बड़ा समझौता किया है।
- Written By: अपूर्वा नायक
ठाणे में हीटवेव (सौ. सोशल मीडिया )
Heatwave In Pune: पुणे शहर में इन दिनों गर्मी का असर तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। शहर के कई हिस्सों में तापमान लगातार बढ़ रहा है और लोगों को उमस भरी गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।
हालिया मौसम रिपोर्ट के अनुसार, कोरेगांव पार्क और लोहगांव जैसे क्षेत्रों में अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है, जो इस मौसम का अब तक का सबसे अधिक स्तर माना जा रहा है। तापमान के साथ-साथ हवा में नमी भी बढ़ी है, जिससे गर्मी और ज्यादा महसूस हो रही है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, तापमान में वृद्धि के साथ वातावरण में मौजूद नमी के कारण लोगों को वास्तविक तापमान से अधिक गर्मी का अनुभव हो रहा है। इसे ‘रियल फील’ तापमान कहा जाता है। बढ़ी हुई उमस के कारण दिन के समय बाहर निकलने वाले लोगों को पसीना, थकान और बेचैनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
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भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार, इस स्थिति के पीछे उत्तर और मध्य भारत से आने वाली गर्म हवाओं के साथ बंगाल की खाड़ी और दक्षिणी क्षेत्रों से आने वाली नम हवाओं का मिलना मुख्य कारण है। विभाग ने अनुमान जताया है कि 10 मार्च तक अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना रह सकता है। फिलहाल तापमान सामान्य सीमा में है, लेकिन यदि इसमें और वृद्धि हुई तो लू जैसी स्थिति भी बन सकती है।
IITM और बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के बीच समझौता
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजिकल (आईआईटीएम) पुणे और बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के बीच जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और दीर्घकालिक सहयोग की शुरुआत हुई है। दोनों संस्थानों ने 50 वर्षों के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए है, जिसे भारत में जलवायु डेटा और शोध के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है।
इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य इंडिया नेशनल क्लाइमेट डेटाबेस को अधिक सटीक और व्यापक बनाना है। इस समझौते के तहत दोनों संस्थान देश में बदलती जलवायु परिस्थितियों, मौसम के दीर्घकालिक पैटर्न और पर्यावरणीय बदलावों पर संयुक्त रूप से शोध करेंगे।
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50 वर्षों की अवधि वैज्ञानिकों को बड़े स्तर पर डेटा संग्रह, विश्लेषण और भविष्य के जलवायु अनुमानों को अधिक स्पष्टता से समझने का अवसर देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना करने में मदद मिलेगी।
