चुनावी वादे और खोखले आश्वासन: पवना बांध विस्थापितों का आक्रोश चरम पर, प्रशासन की सुस्ती पड़ रही भारी
Pavana Dam Rehabilitation Issue: पवना बांध की मरम्मत 19 साल से ठप। विस्थापितों के पुनर्वास का मुद्दा बना बड़ी बाधा। जानें क्यों 2203 परिवार कर रहे हैं विरोध और क्या है प्रशासन का पक्ष।
- Written By: गोरक्ष पोफली
पवना डैम (सोर्स: सोशल मीडिया)
Pavana Dam Repair Work: पुणे जिले की जीवनरेखा माने जाने वाले पवना बांध की सुरक्षा और सुदृढ़ीकरण का कार्य पिछले 19 वर्षों से अधर में लटका हुआ है। मावल तहसील और पिंपरी-चिंचवड़ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण इस बांध की मरम्मत का मुद्दा केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक विफलता की एक लंबी कहानी बन गया है। बांध की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2004 में 22 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई थी, लेकिन विस्थापितों के पुनर्वास का समाधान न होने के कारण वर्ष 2006 से यह कार्य पूरी तरह ठप पड़ा है।
इतिहास और विस्थापन की त्रासदी
पवना बांध का निर्माण कार्य वर्ष 1963 में शुरू होकर 1972 में संपन्न हुआ था। इस विशाल परियोजना के लिए कुल 6,297 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया, जिससे 2,203 खाताधारक परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुछ लोगों का पुनर्वास तो हुआ है, लेकिन सैकड़ों परिवार आज भी न्याय की आस में भटक रहे हैं। विस्थापितों का स्पष्ट रुख है कि जब तक उनकी पुनर्वास प्रक्रिया पूरी नहीं होती, वे बांध के सुदृढ़ीकरण और मरम्मत कार्य का विरोध जारी रखेंगे।
मंत्री के आश्वासन और प्रशासन की सुस्ती
राज्य के जल संसाधन मंत्री राधाकृष्ण विखे पाटिल ने एक वर्ष पहले बांध का निरीक्षण करते समय विस्थापितों की समस्याओं के जल्द समाधान का आश्वासन दिया था। परंतु, ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है क्योंकि एक वर्ष बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।
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पवना बांध विस्थापित संयुक्त कार्य समिति के पदाधिकारियों नारायण बोडके, बाबासाहेब काले और रंभाऊ कालेकर का आरोप है कि सरकार और प्रशासन केवल बैठकें कर रहे हैं और खोखले आश्वासन दे रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा रहा है। समिति का कहना है कि चुनाव के समय तो विस्थापितों के मुद्दों की याद आती है, लेकिन बाद में उनकी उपेक्षा कर दी जाती है।
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आंदोलन की चेतावनी और विभागीय पक्ष
प्रशासन की उदासीनता से तंग आकर विस्थापितों ने अब तीव्र आंदोलन की चेतावनी दी है। समिति के सदस्यों का कहना है कि बांध की सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही जरूरी विस्थापितों के हक की रक्षा करना भी है। दूसरी ओर, सिंचाई विभाग के उप-विभागीय अधिकारी माणिक शिंदे का कहना है कि सुरक्षा की दृष्टि से बांध का सुदृढ़ीकरण अनिवार्य है और प्रशासन पुनर्वास के मुद्दे को हल करने के लिए प्रयासरत है। वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जब तक प्रशासन विस्थापितों को न्याय नहीं देता, पवना बांध की सुरक्षा का यह महत्वपूर्ण कार्य अधर में ही लटका रहेगा।
