पहलगाम नरसंहार की पहली बरसी: आंखें मूंदूं तो गोलियों से भुना चेहरा दिखता है, अपनों को खोने वालों का छलका दर्द
Pahalgam Terror Attack Anniversary: पहलगाम हमले की पहली बरसी पर भावुक हुए परिजन। ऑपरेशन सिंदूर के लिए सेना का आभार, आतंक खत्म करने की मांग।
- Written By: अनिल सिंह
Pahalgam Terror Attack First Anniversary (फोटो क्रेडिट-X)
Pahalgam Terror Attack First Anniversary: जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुई उस खौफनाक आतंकी घटना को आज एक साल पूरा हो गया है, जिसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। पिछले साल 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के दरिंदों ने बैसरन घाटी में 26 निर्दोष लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। आज इस हमले की पहली बरसी पर मृतकों के परिजनों का दर्द एक बार फिर फूट पड़ा है। अपनों को खोने का गम आज भी उतना ही ताजा है, जितना उस काली दोपहर को था।
इस हमले में अपने पति कौस्तुभ गणबोटे को खोने वाली संगीता गणबोटे कहती हैं कि वह मंजर इतना भयानक था कि उसे मरते दम तक भूल पाना मुमकिन नहीं है। उन्होंने रुंधे हुए गले से बताया, “सुबह से शाम तक मैं जिनसे पूछकर खाना बनाती थी, आज उनकी यादों के सहारे जी रही हूँ। आतंकियों ने मेरे पति को मार दिया, जवाब में सरकार उन्हें मार रही है इससे मन थोड़ा हल्का तो होता है, लेकिन मेरे पति वापस नहीं आ सकते।” उन्होंने आतंकियों को संदेश देते हुए कहा कि अगर आपका झगड़ा सरकार से है तो उनसे बात करें, निर्दोषों को मारकर कुछ हासिल नहीं होने वाला।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘ऑपरेशन महादेव’ से मिला मरहम
पहलगाम हमले के तुरंत बाद भारतीय सेना ने आतंकियों को करारा जवाब देने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ और ‘ऑपरेशन महादेव’ शुरू किया था। हमले में जान गंवाने वाले संतोष जगदाले की पत्नी प्रगति जगदाले ने इसके लिए सरकार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “सरकार ने हमारी तकलीफ समझी और कार्रवाई की, मैं आभारी हूँ। लेकिन किसी भी औरत के लिए अपने सामने पति को गोलियों से भुनते देखना असहनीय है। मैं आज भी उसी पल में कैद हूँ।” प्रगति ने सरकार से अपील की कि सेना में भर्ती के नियमों को थोड़ा सरल किया जाए ताकि अधिक से अधिक जवान देश की सुरक्षा में तैनात हो सकें।
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“हिंदू हो या मुसलमान?” आतंकियों की सनक
हमले की चश्मदीद और संतोष जगदाले की बेटी ने उस खौफनाक पल को याद करते हुए बताया कि कैसे एक महज 25 साल का लड़का बंदूक लेकर आया और पूछने लगा “तुम हिंदू हो या मुसलमान? अगर मुसलमान हो तो कलमा पढ़ो।” उन्होंने भावुक होकर सवाल किया कि हम किस घर में जन्म लेते हैं, यह हम तय नहीं करते, फिर यह जबरदस्ती क्यों? उनके लिए यह एक साल बीतने जैसा नहीं है; उनके लिए आज भी वही 22 अप्रैल 2025 का दिन चल रहा है।
न्याय की आस और भविष्य की सीख
पीड़ित परिवारों का मानना है कि असली न्याय उस दिन होगा जब आतंक का जड़ से खात्मा हो जाएगा। संगीता गणबोटे ने एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि स्कूलों में शिक्षा के साथ-साथ बच्चों को यह भी सिखाया जाना चाहिए कि ऐसे आतंकी हमलों की स्थिति में खुद को कैसे बचाएं और कैसा व्यवहार करें। पहलगाम की वादियों में आज सन्नाटा तो है, लेकिन उन 26 परिवारों की चीखें आज भी इंसाफ की गुहार लगा रही हैं।
