

Expressway Crisis System Failure: देश के सबसे व्यस्ततम मार्गों में से एक, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे (Mumbai-Pune Expressway) पर पिछले 32 घंटों से जारी 'महा-संकट' आखिरकार गैस टैंकर हटने के साथ समाप्त तो हो गया, लेकिन इसने सरकारी तंत्र की तैयारियों की पोल खोलकर रख दी है। मंगलवार रात शुरू हुआ यह जाम बुधवार पूरे दिन और गुरुवार सुबह तक लाखों लोगों के लिए 'नर्क' के समान रहा। हजारों वाहन और लाखों यात्री, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे, बिना भोजन, पानी और शौचालय की व्यवस्था के सड़कों पर फंसे रहे। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा करने वाले देश में एक दुर्घटना पूरे सिस्टम को 32 घंटे तक पंगु बना सकती है?
यह जाम लोनावला और खालापुर के बीच गैस टैंकर पलटने और उससे हुए रिसाव के कारण लगा था। सुरक्षा कारणों से यातायात रोकना जरूरी था, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था और फंसे हुए लोगों तक पहुँचने में प्रशासन पूरी तरह विफल नजर आया।
इस जाम के दौरान एक घटना ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। पुणे के प्रसिद्ध उद्योगपति सुधीर मेहता, जो खुद इस जाम में फंसे थे, ने अपनी स्थिति को देखते हुए खुद को एयरलिफ्ट (Airlift) करवाया। उन्होंने ट्वीट कर अपनी परेशानी साझा की और सवाल उठाया कि ऐसी इमरजेंसी के लिए हमारे पास कोई 'एग्जिट प्लान' क्यों नहीं है? उनके इस ट्वीट के बाद जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। लोगों का कहना है कि संपन्न लोग तो खुद को बचा सकते हैं, लेकिन उन हजारों ट्रक ड्राइवरों और मध्यमवर्गीय परिवारों का क्या, जिनके पास कोई विकल्प नहीं था?
हैरानी की बात यह रही कि 32 घंटे तक लाखों लोग सड़क पर बिलखते रहे, लेकिन न तो मुख्यमंत्री, न उपमुख्यमंत्री और न ही स्थानीय सांसद या विधायक ने मौके पर पहुँचकर राहत कार्यों का जायजा लिया। पुणे ग्रामीण पुलिस ने 'देवदूत' बनकर कुछ इलाकों में बिस्किट और पानी पहुँचाया, लेकिन एक्सप्रेसवे का वह हिस्सा जहाँ कोसों दूर तक कोई गांव या दुकान नहीं है, वहां लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते रहे। स्थानीय प्रशासन द्वारा कोई बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन या मोबाइल टॉयलेट की व्यवस्था नहीं की गई, जिसने महिलाओं की परेशानी को कई गुना बढ़ा दिया।
इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि हमारे पास 'डिजास्टर मैनेजमेंट' के नाम पर सिर्फ कागजी योजनाएं हैं। एक्सप्रेसवे पर दुर्घटनाएं होना सामान्य है, लेकिन उसे क्लियर करने में 32 घंटे लगना और फंसे हुए लोगों को बेसहारा छोड़ देना अक्षम्य है। जानकारों का मानना है कि एक्सप्रेसवे पर हर 10 किलोमीटर पर 'इमरजेंसी बे' और ड्रोन के जरिए निगरानी की जरूरत है ताकि ऐसी स्थिति में हवाई मार्ग से तुरंत मदद पहुँचाई जा सके। अब देखना यह है कि क्या सुनेत्रा पवार और देवेंद्र फडणवीस की सरकार इस पर कोई ठोस एक्शन लेती है या इसे सिर्फ एक 'हादसा' मानकर भुला दिया जाएगा।