नवरात्रि
पुणे: देश में इन दिनों नवरात्रि की धूम है। जगह-जगह नवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा है। बंगाली समुदाय इसे दुर्गा पूजा के रूप में मनाते है। इस दौरान मां दुर्गा की पूजा और आराधना प्रमुख रूप से की जाती है। बात करें पुणे शहर की तो यहां भी कई जगह दुर्गा पूजा की धूम दिखाई दे रही है। शिवाजीनगर, वाकड, धानौरी, विमाननगर, खड़की, कोंढवा आदि में भव्य पंडाल सजाए गए है। पंडालों में मां दुर्गा की स्थापना भी हो गयी है। लोग माता के दर्शन के लिए पंडालों में पहुंच रहे है।
बंगीय संस्कृति संसद कमिटी द्वारा कांग्रेस भवन शिवाजीनगर में बड़े ही धूमधाम से दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है। 9 अक्टूबर को महा षष्ठी का पर्व मनाया गया। मां दुर्गा की पूजा की गयी। इस दौरान पश्चिम बंगाल के बुलढाणा जिले के कलना शहर के बरुइपारा से खास ढाकी (बंगाली कल्चर का ढोल बैंड) को आमंत्रित किया गया था।
बता दें, कि ढाकियों की 3 पीढ़ियां यहां आती रही है। इस साल नारू गोपाल दास (मुख्य ढाकी), उनके बेटे तारक दास और उनके बेटे अमर दास (यानी नारू गोपाल दास के पोते) और नारू के दूसरे बेटे सुजान दास हर साल वे दुर्गा पूजा के दौरान आते थे। वे अन्य समय में पेशे से किसान हैं।
इस साल बंगीय संस्कृति संसद कमेटी का ‘बांकुरा हस्तशिल्प’ थीम रखा गया है। पूरे पंडाल में बांकुरा हस्तशिल्प का नजारा देखने को मिलेगा। बांकुड़ा घोड़ा (Bankura horse) टेराकोटा का बना एक घोड़े के रूप का हस्तशिल्प होता है। यह भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बांकुड़ा ज़िले के पांचमुड़ा में बनाया जाता है। इसे कई घरों में सजावट के लिए रखा जाता है।
बांकुरा के लोगों को विरासत में मिली शानदार सांस्कृतिक विरासत ने उन्हें एक गहरी सौंदर्य बोध से संपन्न किया है। जिसमें कलात्मक बोध बालूचरी साड़ियों, डोगरा वस्तुओं और टेरा-कोटा जैसी पारंपरिक कलाओं और शिल्पों में झलकता है। बांकुरा हस्तशिल्प पुरे देशभर में फेमस है।
बंगीय संस्कृति संसद के अध्यक्ष मधुमिता घोष ने बताया कि, “इस साल बंगीय संस्कृति संसद कमेटी का ‘बांकुरा हस्तशिल्प’ थीम रखा गया है। पूरे पंडाल में बांकुरा हस्तशिल्प का नजारा देखने को मिलेगा। बुधवार को महा षष्ठी की गयी। इस दौरान कई धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।”
इस समुदाय के लोग बंगाल से गंगा मिट्टी लाकर अपने हाथों से मां दुर्गा की प्रतिमा बनाते हैं। कई जगह इसकी प्रथा है। यह प्रथा सालों से चली आ रही है। उनकी पूजा सामान्य पूजा से भिन्न होती है।
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वे मां दुर्गा के सामने पारंपरिक आरती या पाठ नहीं करते, बल्कि 9 दिनों तक मां दुर्गा की मूर्ति के सामने बैठकर अपने जीवन के सुख-दुख की बातें मां को बताते हैं और पूरे विश्व में शांति और कल्याण की प्रार्थना करते हैं। यह पूजा न केवल उनकी धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि अपनी भावनाओं को मां दुर्गा के साथ साझा करने का एक माध्यम भी है।
इस बार मां दुर्गा पालकी पर सवार होकर आयी है। माता का आगमन पालकी या डोली में होना अशुभ माना जाता है। ऐसे में अर्थव्यवस्था में गिरावट, व्यापार में मंदी, देश-दुनिया में महामारी, हिंसा के बढ़ने और अप्राकृतिक घटना के संकेत मिलते हैं। नवरात्रि में मां दुर्गा के प्रस्थान की सवारी चरणायुद्ध (मुर्गा) होगी, जिसे शुभ संकेत बिलकुल नहीं माना जाता है। माता के इस वाहन को अमंगलकारी माना गया है। ये शोक, कष्ट का संकेत है।
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पुजारी भरत पंडित ने बताया, ” बंगाली समुदाय मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान को बहुत महत्व देते है। मान्यता है कि माता का पालकी या डोली में आगमन और मुर्गा में प्रस्थान बिल्कुल भी शुभ नहीं होता है। इस बार के संकेत शुभ नहीं है। लेकिन, मैं मां दुर्गा से हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि पुरे संस्कार को बुरी नजर से बचाये। हमारा देश, समाज तरक्की करें। मां का आशीर्वाद सदैव हम पर बने रहे।”