

Independence Day Chapekar Brothers Plague Atrocities: भारत की आजादी की कहानी केवल 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद या 1857 की क्रांति तक सीमित नहीं है। आजादी की लड़ाई की जमीन बहुत पहले तैयार हो रही थी। महाराष्ट्र में 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष धीरे-धीरे गहराता जा रहा था। इसी दौर में पुणे से तीन भाइयों की ऐसी कहानी सामने आई, जिसने आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की दिशा पर गहरा प्रभाव डाला। ये थे, दामोदर हरि चाफेकर, बालकृष्ण हरि चाफेकर और वासुदेव हरि चाफेकर।
चाफेकर बंधुओं की कहानी को केवल एक हत्या या एक आपराधिक घटना के रूप में देखना इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा। यह उस समय के सामाजिक-राजनीतिक वातावरण, पुणे में फैली प्लेग महामारी, ब्रिटिश प्रशासन की कठोर नीतियों और भारतीय समाज में बढ़ते आक्रोश की कहानी भी है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इतिहास को भावनात्मकता के साथ-साथ तथ्यों के आधार पर समझा जाए। रैंड की हत्या में तीनों भाइयों की भूमिका एक जैसी नहीं थी और तीनों को एक ही मुकदमे में फांसी नहीं दी गई थी।
1896 के आसपास बॉम्बे प्रेसीडेंसी में ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप गंभीर रूप लेने लगा। पुणे भी इससे बुरी तरह प्रभावित हुआ। महामारी से निपटने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने विशेष प्लेग व्यवस्था बनाई और वाल्टर चार्ल्स रैंड को पुणे की प्लेग समिति का अध्यक्ष बनाया गया। प्रशासन का उद्देश्य बीमारी को नियंत्रित करना था, लेकिन इसे लागू करने के तरीके ने आम लोगों में भारी असंतोष पैदा किया।
प्लेग नियंत्रण के नाम पर घरों की तलाशी, लोगों को अलग करना, संक्रमित लोगों को शिविरों में भेजना और निजी जीवन में प्रशासनिक दखल जैसी कार्रवाइयों ने लोगों को बेचैन कर दिया। भारतीय समाज के लिए घर और धार्मिक स्थानों की पवित्रता बेहद महत्वपूर्ण थी। ऐसे में तलाशी अभियान और सैनिकों की मौजूदगी ने असंतोष को और बढ़ाया। सरकारी उपायों को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और नाराजगी बढ़ती गई।
इसी माहौल में पुणे के राष्ट्रवादी वातावरण ने भी चाफेकर बंधुओं के विचारों को प्रभावित किया। उस समय बाल गंगाधर तिलक अपने समाचार पत्र केसरी के माध्यम से ब्रिटिश प्रशासन की नीतियों की आलोचना कर रहे थे। चाफेकर बंधु भी राष्ट्रवादी गतिविधियों और शारीरिक प्रशिक्षण से जुड़े हुए थे। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के रिकॉर्ड में भी उन्हें महाराष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़े क्रांतिकारी के रूप में दर्ज किया गया है।
चाफेकर बंधुओं के लिए रैंड केवल एक ब्रिटिश अधिकारी नहीं रह गया था। उनके दृष्टिकोण से वह पुणे में प्लेग नियंत्रण के दौरान अपनाई गई कठोर नीतियों का प्रतीक बन चुका था। उस समय ब्रिटिश प्रशासन महामारी को रोकने के लिए सख्त कदम उठा रहा था, लेकिन स्थानीय लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होती गई कि इन उपायों में भारतीयों की सामाजिक और धार्मिक संवेदनाओं का पर्याप्त सम्मान नहीं किया जा रहा है।
यही असंतोष धीरे-धीरे हिंसक प्रतिरोध की ओर बढ़ा। इतिहास के इस अध्याय को समझते समय यह अंतर याद रखना जरूरी है कि महामारी से लड़ने के प्रशासनिक उपाय और उनके क्रियान्वयन के तरीके दो अलग बातें थीं। प्लेग वास्तव में गंभीर स्वास्थ्य संकट था, लेकिन उसके नियंत्रण के लिए अपनाई गई कठोर कार्रवाइयों ने राजनीतिक और सामाजिक तनाव को बढ़ाने में भूमिका निभाई।
22 जून 1897 को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की डायमंड जुबली के अवसर पर पुणे के गवर्नमेंट हाउस में समारोह आयोजित किया गया था। समारोह समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारी अपने वाहनों से लौट रहे थे। चाफेकर बंधुओं ने इसी अवसर को रैंड को निशाना बनाने के लिए चुना।
गणेशखिंड क्षेत्र में लौट रहे अधिकारियों के काफिले के दौरान हमला हुआ। इस घटना में लेफ्टिनेंट चार्ल्स आयर्स्ट भी गोली का निशाना बने। रैंड को भी गोली मारी गई। आयर्स्ट की मृत्यु तत्काल हुई, जबकि रैंड ने कुछ दिनों बाद, 3 जुलाई 1897, चोटों के कारण दम तोड़ दिया।
इस घटना ने ब्रिटिश प्रशासन को झकझोर दिया। पुणे में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और हत्याकांड की जांच शुरू हुई। चाफेकर बंधुओं की तलाश तेज हुई। आगे की जांच में सरकारी मुखबिरों की भूमिका सामने आई और धीरे-धीरे पुलिस चाफेकर परिवार तक पहुंची।
रैंड हत्याकांड के बाद दामोदर हरि चाफेकर गिरफ्तार किए गए। उनके बयान और मुकदमे की प्रक्रिया ने ब्रिटिश सरकार को उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार दिया। उन्हें हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया और 18 अप्रैल 1898 को फांसी दी गई। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के रिकॉर्ड में भी दामोदर चाफेकर की गिरफ्तारी और 18 अप्रैल 1898 को फांसी दिए जाने का उल्लेख है।
दामोदर की फांसी के साथ कहानी खत्म नहीं हुई। उनके छोटे भाई बालकृष्ण और वासुदेव भी आगे चलकर ब्रिटिश दमन और मुकदमों के घेरे में आए।
बालकृष्ण हरि चाफेकर भी 22 जून 1897 की घटना से जुड़े थे। उन्हें बाद में गिरफ्तार किया गया और रैंड तथा आयर्स्ट हत्याकांड से संबंधित मुकदमे में दोषी ठहराया गया। 12 मई 1899 को बालकृष्ण चाफेकर को फांसी दी गई।
यहीं पर चाफेकर बंधुओं की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। अक्सर यह कहा जाता है कि रैंड की हत्या के आरोप में तीनों भाइयों को फांसी दी गई थी। लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार यह पूरी तरह सही नहीं है।
सबसे छोटे भाई वासुदेव हरि चाफेकर की भूमिका अलग थी। रैंड और आयर्स्ट की 1897 की हत्या में उनके भाइयों दामोदर और बालकृष्ण की सीधी भूमिका थी। बाद में दामोदर और बालकृष्ण की गिरफ्तारी में सरकारी मुखबिरों के रूप में द्रविड़ बंधुओं की भूमिका सामने आई। वासुदेव ने अपने साथियों के साथ इन मुखबिरों को निशाना बनाया। इस मामले में वासुदेव चाफेकर और उनके सहयोगी महादेव विनायक रानडे को गिरफ्तार किया गया और बाद में दोनों को मौत की सजा सुनाई गई।
8 मई 1899 को वासुदेव चाफेकर को फांसी दी गई, जबकि महादेव रानडे को 10 मई और बालकृष्ण चाफेकर को 12 मई 1899 को फांसी दी गई। इस तरह तीनों चाफेकर भाइयों का जीवन ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके क्रांतिकारी रास्ते और उससे जुड़े मुकदमों में समाप्त हुआ।
नहीं। यही वह पहलू है जो उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में महत्वपूर्ण बनाता है। 1897 की घटना को भारत में शुरुआती क्रांतिकारी राजनीतिक हिंसा की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। यह वह समय था जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष केवल याचिकाओं और संवैधानिक सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह रहा था। कुछ युवा यह मानने लगे थे कि औपनिवेशिक सत्ता का मुकाबला अधिक आक्रामक तरीके से करना होगा।
चाफेकर बंधुओं की कार्रवाई ने महाराष्ट्र के युवा वर्ग में गहरी प्रतिक्रिया पैदा की। बाद की पीढ़ी के क्रांतिकारियों पर भी इसका प्रभाव पड़ा। यही कारण है कि चाफेकर बंधुओं का नाम भारतीय क्रांतिकारी परंपरा के शुरुआती अध्यायों में बार-बार सामने आता है।
भारत सरकार के Azadi Ka Amrit Mahotsav के रिकॉर्ड में भी चाफेकर बंधुओं को स्वतंत्रता संघर्ष के उन चेहरों में शामिल किया गया है, जिन्हें देश के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में याद किया जाना चाहिए।
चाफेकर बंधुओं की कहानी को आज के संदर्भ में समझने के लिए दो बातें साथ-साथ देखनी होंगी। पहली, वह औपनिवेशिक शासन था जिसमें भारतीयों को राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया था और प्रशासनिक फैसलों में उनकी भागीदारी बेहद सीमित थी। दूसरी, चाफेकर बंधुओं ने जिस रास्ते का चुनाव किया, वह हिंसक प्रतिरोध का रास्ता था।
इतिहासकारों के लिए यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि औपनिवेशिक शासन के प्रति असंतोष किस तरह राजनीतिक हिंसा में बदल सकता है। इसे समझना किसी हिंसक घटना का समर्थन करना नहीं, बल्कि उस दौर की मानसिकता और परिस्थितियों को समझना है।
चाफेकर बंधुओं का बलिदान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने समय में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने का जोखिम उठाया। उनके जीवन और मृत्यु ने महाराष्ट्र में क्रांतिकारी विचारों के प्रसार में एक शुरुआती भूमिका निभाई। बाद के दशकों में देश के अलग-अलग हिस्सों में क्रांतिकारी संगठनों और युवाओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया।
आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं तो तिरंगे के नीचे खड़े होकर आजादी की कीमत को याद करना भी जरूरी है। स्वतंत्रता केवल 15 अगस्त 1947 की तारीख नहीं है। इसके पीछे दशकों तक चला संघर्ष, जेल, निर्वासन, फांसी और असंख्य लोगों का त्याग था।
चाफेकर बंधुओं का अध्याय इसी लंबी यात्रा का शुरुआती और बेहद तीखा हिस्सा है। पुणे की प्लेग त्रासदी, रैंड की कठोर प्रशासनिक नीतियां, 22 जून 1897 की हत्या, उसके बाद की गिरफ्तारियां, मुकदमे और अंततः तीनों भाइयों की फांसी, इन घटनाओं ने महाराष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्ष में एक अलग अध्याय जोड़ा।
दामोदर चाफेकर 18 अप्रैल 1898 को, वासुदेव चाफेकर 8 मई 1899 को और बालकृष्ण चाफेकर 12 मई 1899 को फांसी पर चढ़े। लेकिन उनके नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में दर्ज रहे।
आजादी के अमृतकाल में चाफेकर बंधुओं को याद करने का अर्थ केवल उनके बलिदान को गौरवगाथा बनाकर पेश करना नहीं है। असली अर्थ है उस दौर को समझना, जब औपनिवेशिक सत्ता, महामारी, सामाजिक अपमान और राजनीतिक असंतोष ने मिलकर एक ऐसी परिस्थिति पैदा की, जिसमें कुछ युवाओं ने अपने जीवन की कीमत पर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने का फैसला किया।
यही वजह है कि पुणे के चाफेकर बंधुओं की कहानी स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में आज भी एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ती है, आखिर आजादी की कीमत कितनी बड़ी थी और उसे हासिल करने के लिए कितनी पीढ़ियों ने अपना वर्तमान कुर्बान किया?