

Astrological Importance Of Kumbh Dhwaja: त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ धर्म ध्वजा फहराने की सदियों से चली आ रही अमृत परंपरा ज्योतिषीय कालचक्र और दशदिशाओं का भव्य प्रतीक है। त्र्यंबकेश्वर मे आगामी 31 अक्टूबर को 12:02 पर जैसे ही संघर्ष की पावन बेला का शुभारंभ होता है इस धर्म ध्वज के रोहन करने की तैयारी शुरू हो गई है।
इस संबंध में त्र्यंबकेश्वर पुरोहित संघ के अध्यक्ष मनोज भी थेटे ने बताया कि आगामी सिंहस्थ कुंभमेले के पावन अवसर पर श्रीक्षेत्र त्र्यंबकेश्वर में फहराए जाने वाले सिंहस्थ ध्वज का धार्मिक, पौराणिक और ज्योतिषीय महत्व अत्यंत विशेष है।
पुरोहित संघ, त्र्यंबकेश्वर द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, यह ध्वज केवल एक धार्मिक पताका नहीं है, बल्कि यह अमृत कुंभ की पौराणिक गाथा और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का जीवंत दर्शन कराता है। अमृत रक्षा के प्रमुख प्रतीक (सूर्य, चंद्र और बृहस्पति) पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान प्राप्त अमृतकुंभ की रक्षा में सूर्य, चंद्र और देवगुरु बृहस्पति की मुख्य भूमिका रही है।
इसी ऐतिहासिक और धार्मिक स्मरण को बनाए रखने के लिए सिंहस्थ ध्वज पर इन तीनों को प्रमुख स्थान दिया गया है। ये घटक सिंहस्थ पर्व की कालनिर्णय और धार्मिक परंपरा के मुख्य आधार माने जाते हैं। बृहस्पती का सिंह राशि में प्रवेश और सिंहस्थ पर्व इस महापर्व को सिंहस्थ' कहे जाने के पीछे बृहस्पति का सिंह राशि में गोचर मुख्य कारण है।
भारतीय ज्योतिषीय गणना के अनुसार- बृहस्पति ग्रह प्रत्येक राशि में लगभग 12 से 13 महीने तक भ्रमण करता है। सभी बारह राशियों का अपना चक्र पूरा करने में गुरु को लगभग 12 वर्ष का समय लगता है। जब बृहस्पति पुनः सिंह राशि में प्रवेश करता है, तब सिंहस्थ पर्व का संयोग बनता है। बारह राशियां और बारह घंटियां इस विशेष ध्वज के किनारे पर कुल 12 घंटियां लगाई गई हैं।
ये घंटियां केवल सजावट का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह बारह राशियों और गुरु ग्रह के 12 वर्षीय भ्रमणचक्र की प्रतीक हैं। ध्वज पर अंकित अन्य प्रमुख प्रतीक और उनके अर्थसिंह और मगर: सिंहस्थ कुंभ के नाम को सार्थक करता सिंह का चित्र इस पर्व की प्रत्यक्ष पहचान है। इसके साथ ही, गोदावरी नदी के उद्गम और कुशावर्त तीर्थ से जुड़े त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में गंगा गोदावरी का वाहन म मगर भी ध्वज पर दर्शाया गया है, क्योंकि सिंहस्थ मूलतः गोदावरी का ही उत्सव है। ॐ और स्वस्तिक यह दोनों मंगल चिह्न सकारात्मकता और पवित्रता को दर्शाते हैं। ह्रीं यह ध्वनि वैश्विक चेतना, माया और सृजन शक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
ध्वज पर पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान्य, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ऊर्ध्व और अवाच्य इन दसों दिशाओं का निर्देश है, जो सिंहस्थ के वैश्विक विस्तार और व्यापकता को प्रकट करता है। अमृत परंपरा के स्मरण, गुरु के राशिचक्र, गोदावरी के वाहन और समस्त देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाला यह सिंहस्थ ध्वज त्र्यंबकेश्वर की संस्कृति और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम है।
वैसे तो श्री क्षेत्र त्र्यंबकेश्वर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इस क्षेत्र का एक अलग ही महत्व और धार्मिक मान्यता है लेकिन सिंहस्थ धर्म ध्वजारोहण के समय सनातन धर्म के सर्वोच्च चार पीठ में से श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य की गरिमय मौजूदगी के दौरान धर्म ध्वज का रोहणअपने आप इसके धार्मिक ऐतिहासिक महत्व को चार गुना बढ़ा देता है।
यही नहीं इस दौरान 10 नामी नागा सन्यासी परंपरा के सभी संत अखाड़े और उदासीन परंपरा के तीन अखाड़े के महंत अध्यक्ष सचिव महामंडलेश्वर जगतगुरु भी मौजूद रहेंगे और इस दौरान वैदिक मंत्र उच्चारण के साथ धर्म ध्वज की स्थापना इस देश के अन्य तीन कुंभ स्थलों से अलग बनाती है।