

Superstition in Nashik: स्वयंघोषित कैप्टन अशोक खरात के खिलाफ पुलिसिया हंटर चलने के बाद जिले के ढोंगी बाबाओं में जो खौफ पैदा हुआ था, वह अब धीरे-धीरे काफूर होता नजर आ रहा है। जैसे ही मामला शांत हुआ, जिले के ग्रामीण अंचलों में सक्रिय तथाकथित बाबाओं ने अपने ‘दरबार’ फिर से सजाने शुरू कर दिए हैं। आस्था की आड़ में भोले-भाले ग्रामीणों को लूटने का यह काला कारोबार अब और भी संगठित तरीके से पैर पसार रहा है, जिससे जागरूक नागरिकों में भारी नाराजगी है।
ये ढोंगी बाबा लोगों की मानसिक और आर्थिक मजबूरी को अपना हथियार बनाते हैं। गंभीर बीमारियां, पारिवारिक कलह और कर्ज जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को 'दैवीय शक्ति' और 'चमत्कार' का झांसा दिया जाता है। शरीर में शक्ति प्रवेश करने और भविष्य बताने के नाम पर तांत्रिक क्रियाओं का दिखावा किया जाता है। गुप्त सूत्रों के अनुसार, गुरुवार और रविवार को इन ठिकानों पर भारी भीड़ जुटती है, जहाँ समस्या हल करने के नाम पर श्रद्धालुओं की जेब खाली की जाती है।
चिंताजनक बात यह है कि अब केवल अशिक्षित ग्रामीण ही नहीं, बल्कि बेरोजगार और शिक्षित युवा भी इन ढोंगी बाबाओं के जाल में फंस रहे हैं। इन बाबाओं ने प्रचार-प्रसार का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया है, जहाँ उनके 'चेले' घर-घर जाकर बनावटी चमत्कारों की कहानियां सुनाते हैं। नासिक जिले के 2,000 से अधिक गांवों में यह स्थिति है कि हर 10-12 गांवों के क्लस्टर में एक 'दरबार' सक्रिय है, जो अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून (2013) की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा है।
अंधविश्वास का यह जहर केवल गांवों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह राजनीति की गलियों तक भी पहुँच गया है। हाल ही में नासिक महानगरपालिका और ओझर-निफाड निकाय चुनावों के दौरान उम्मीदवारों के घरों के बाहर नींबू, नारियल और कुमकुम मिलने जैसी घटनाएं सामने आई थीं। विरोधियों को परास्त करने के लिए जादू-टोने का सहारा लेना समाज में बढ़ती वैज्ञानिक सोच की कमी और डर के माहौल को दर्शाता है।
अशोक खरात प्रकरण के बाद जनता में जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन अब लोग प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल उठा रहे हैं। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर द्वारा शुरू किए गए अंधश्रद्धा विरोधी आंदोलन की मशाल को आगे बढ़ाते हुए, अब जनता मांग कर रही है कि पुलिस और प्रशासन इन बाबाओं की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करे। लोगों का कहना है कि जब तक इन 'लुटेरों' को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक आस्था के नाम पर मासूमों का शोषण बंद नहीं होगा।