पहले देवता और नागा साधु लेंगे डुबकी, फिर मिलेगी आम जनता को अनुमति! जानिए सिंहस्थ कुंभ में अमृत स्नान की परंपरा

Nashik Kumbh Amrit Snan: नासिक सिंहस्थ कुंभ में अमृत स्नान की खास परंपरा जानिए। सबसे पहले अखाड़ों के इष्टदेव, फिर आचार्य, संत-महंत और अंत में आम श्रद्धालु स्नान करते हैं।
Nashik Simhastha Kumbh Mela Amrit Snan 13 Akhada
नासिक सिंहस्थ कुंभ मेला अमृत स्नान 13 अखाड़ासोर्स: सोशल मीडिया
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Highlights

  • सिंहस्थ कुंभ मेले में अमृत स्नान सबसे प्रमुख धार्मिक आकर्षण होता है।

  • परंपरा के अनुसार सबसे पहले अखाड़ों के इष्टदेव स्नान करते हैं।

  • इसके बाद आचार्य, महामंडलेश्वर, संत-महंत और साधु स्नान करते हैं।

  • सनातन परंपरा में 13 अखाड़ों को मान्यता प्राप्त है।

  • अखाड़े मुख्य रूप से शैव, वैष्णव और उदासीन/निर्मल परंपराओं से जुड़े हैं।

Nashik Simhastha Kumbh Mela Amrit Snan 13 Akhada: सिंहस्थ कुंभ मेले में अमृत स्नान की परंपरा बेहद खास है। इसमें सबसे पहले अखाड़ों के इष्टदेव को स्नान कराया जाता है। इसके बाद आचार्य, महामंडलेश्वर, संत-महंत और साधु स्नान करते हैं। सभी अखाड़ों की स्नान प्रक्रिया पूरी होने के बाद आम श्रद्धालुओं को नदी में डुबकी लगाने का अवसर मिलता है।

इष्टदेव का प्रथम स्नान

नासिक सिंहस्थ कुंभ मेले का धर्म ध्वजारोहण के साथ ही औपचारिक आगाज हो चुका है। अब इस महापर्व के सबसे प्रमुख आकर्षण यानी अखाड़ों के अमृत स्नान को लेकर श्रद्धालुओं में उत्सुकता है। कुंभ के दौरान जब सोने-चांदी के सिंहासनों पर विराजमान आचार्य महामंडलेश्वर, जगद्गुरु, महंत और नागा संन्यासी हाथियों, घोड़ों तथा रथों पर सवार होकर स्नान के लिए निकलते हैं, तो यह भव्य दृश्य देश-दुनिया का ध्यान आकर्षित करता है।

सनातन परंपरा में अमृत स्नान का एक निर्धारित क्रम है। इसमें सबसे पहले अखाड़ों के इष्टदेव को देवताओं के प्रतीक स्वरूप स्नान कराया जाता है। इसके बाद आचार्य और महामंडलेश्वर, फिर संत-महंत तथा साधु-संन्यासी अमृत स्नान करते हैं। सभी अखाड़ों की स्नान प्रक्रिया पूरी होने के बाद आम श्रद्धालुओं को नदी में स्नान की अनुमति मिलती है।

13 अखाड़ों को मिली है मान्यता

सनातन धर्म की रक्षा, साधना और संगठन में अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। परंपरागत रूप से 13 अखाड़ों को मान्यता प्राप्त है। विचारधारा, उपासना पद्धति और इष्टदेव के आधार पर इन्हें तीन प्रमुख परंपराओं में बांटा जाता है-शैव, वैष्णव और उदासीन/निर्मल।

शैव परंपरा के अखाड़े भगवान शिव और उनके परिवार से जुड़े देवी-देवताओं की उपासना करते हैं। इन अखाड़ों में नागा संन्यासियों की विशेष पहचान है। वहीं वैष्णव परंपरा के साधु भगवान विष्णु और उनके विभिन्न अवतारों की भक्ति में लीन रहते हैं।

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वैष्णव साधुओं को कहते हैं बैरागी

वैष्णव परंपरा के साधुओं को बैरागी भी कहा जाता है। इस संप्रदाय में भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की उपासना का विशेष महत्व है। श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़े के मुख्य आराध्य देव मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण हैं। श्री पंच निर्वाणी अनी अखाड़े के इष्टदेव संकटमोचन हनुमान हैं, जबकि श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़े के मुख्य आराध्य देव भगवान श्रीराम माने जाते हैं।

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आस्था और परंपरा का संगम

कुंभ का अमृत स्नान केवल नदी में डुबकी लगाने की धार्मिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह अपने इष्टदेव के प्रति समर्पण और सनातन संस्कृति की विविध परंपराओं का भव्य प्रदर्शन भी है। प्रत्येक अखाड़ा अपने संप्रदाय, इष्टदेव के छत्र-निशान और विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के साथ नदी तट पर पहुंचता है।

अखाड़ों की अलग-अलग वेशभूषा, धार्मिक प्रतीक, साधना पद्धति और स्नान का निर्धारित क्रम भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाते हैं। यही वजह है कि कुंभ का अमृत स्नान देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।