60 दिन में तैयार फसल, सालभर कमाई का मौका; नासिक में करेले की खेती बनी किसानों के लिए मुनाफे का सौदा
Nashik Agriculture: नासिक में आधुनिक तकनीक से करेले की खेती किसानों के लिए लाभदायक बन रही है। 60–70 रुपये किलो भाव और ड्रिप सिंचाई व मल्चिंग से कम लागत में बेहतर उत्पादन मिल रहा है।
- Written By: अंकिता पटेल
Nashik Bitter Gourd Farming ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Nashik Bitter Gourd Farming: नासिक आधुनिक प्रबंधन और उन्नत किस्मों के कारण करेले की खेती अब किसानों के लिए एक फायदे का सौदा साबित हो रही है। बाजार में वर्तमान में करेले का भाव 60 से 70 रुपये प्रति किलो है, और भीषण गर्मी को देखते हुए इसके और भी बढ़ने की संभावना है। करेले को अब साल भर चलने वाली फसल के रूप में देखा जा रहा है।
किसान आमतौर पर जनवरी-फरवरी और फिर मई के महीने में इसकी बुवाई करते हैं। उन्नत पद्धति (मल्विंग पेपर और ड्रिप सिंचाई) का उपयोग करने पर बुवाई के मात्र 60 दिनों के भीतर फसल की तुड़ाई शुरू हो जाती है।
1 एकड़ में लगाए जातें हैं 8 हजार पौधे एक एकड़ में लगभग 8,000 पौधे लगाए जाते हैं, जो नर्सरी से 3.50 से 4 रुपये प्रति पौधे की दर से खरीदे जाते हैं। खाद, पौधे और दवाओं को मिलाकर प्रति एकड़ लगभग 30 से 40 हजार रुपये का खर्च आता है।
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बेलों को सहारा देने के लिए बांस और तारों का उपयोग करके मंडप तैयार किया जाता है। इससे दवा छिड़काव, तुड़ाई और परिवहन में आसानी होती है और फसल रोगों से बच्ची रहती है। मल्चिंग और टपक सिंचाई (ड्रिप) के कारण पानी की भारी बचत होती है और बीमारियां भी कम लगती हैं।
गर्मियों में करें दवा का छिड़काव
गर्मियों में क्रिप्स और वायरस के प्रभाव को रोकने के लिए इमिडाक्लोप्रिड और एमामेक्टिन केंजोएट के छिड़काव की सलाह दी गई है। मानसून में फफूंद जनित रोगों (भुरी, डावणी, करपा) के लिए हेक्साकोनाजोल या मैकोजेब का उपयोग करें, इसके नियंत्रण के लिए फेरोमोन ट्रैप का उपयोग सबसे प्रभावी बताया गया है।
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करेला स्वाभाविक रूप से कड़वा होता है, इसलिए कटाई के बाद इसे किसी विशेष प्रोसेसिंग की आवश्यकता नहीं होती, जिससे किसान का खर्च और मेहनत बचती है।
कमाई का गणितः किसानों की जुबानी
किसान नवनाथ बोरगुडे बताते हैं कि पिछले साल उन्होंने एक एकड़ से 1500 से 1700 कैरेट का उत्पादन लिया और भाव कम होने के बावजूद लगभग 4 लाख रुपये की कमाई की। सहायक कृषि अधिकारी संजय मोरे के अनुसार, उचित प्रबंधन से प्रति एकड़ 100 क्विंटल तक औसत उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
