सुनवाई पूरी, विनायकराव देशमुख हाईस्कूल प्रकरण में रिपोर्ट का अता-पता नहीं

Shalarth ID Scam: नागपुर के विनायकराव देशमुख हाईस्कूल में मुख्याध्यापक पद से जुड़े मामले में 3 नवंबर को सुनवाई पूरी होने के बावजूद शिक्षा उपसंचालक की रिपोर्ट डेढ़ महीने बाद भी सामने नहीं आई है।
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विनायकराव देशमुख हाईस्कूल प्रकरण में रिपोर्ट का अता-पता नहीं
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Nagpur Education News: एक ओर जहाँ शालार्थ आईडी घोटाले की आग अभी भी ठंडी नहीं हुई है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा उपसंचालक कार्यालय की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। शांतिनगर स्थित विनायकराव देशमुख हाईस्कूल में मुख्याध्यापक पद को लेकर प्रदीप बिबटे से संबंधित प्रकरण में 3 नवंबर को हुई सुनवाई का निष्कर्ष डेढ़ महीने बाद भी सामने नहीं आ सका है। इस देरी के कारण शिक्षकों के सोशल मीडिया समूहों में शिक्षा उपसंचालक पर राजनीतिक दबाव में काम करने की चर्चाएँ तेज हो गई हैं।

शिक्षा उपसंचालक द्वारा प्रदीप बिबटे की मुख्याध्यापक पद पर दी गई मान्यता रद्द किए जाने के बाद संबंधित संस्था ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने तत्कालीन शिक्षा उपसंचालक द्वारा ली गई सुनवाई को आधार बनाकर आदेश जारी करने के बजाय वर्तमान उपसंचालक को दोबारा सुनवाई करने के निर्देश दिए थे। इसके अनुसार 3 नवंबर को इस प्रकरण की सुनवाई निर्धारित की गई।

विनायकराव देशमुख हाईस्कूल प्रकरण पर शिक्षा उपसंचालक का टालमटोल

इस मामले में अनुसूचित जनजाति वर्ग के एक शिक्षक ने मुख्याध्यापक पद पर अपना दावा पेश किया। शिक्षक ने सेवा में 9 वर्ष पूर्ण होने और पिछड़ा वर्ग उपायुक्त द्वारा जारी बिंदुनामावली के आधार पर स्वयं को दावेदार बताया, जिससे प्रकरण में नया मोड़ आ गया।

रिपोर्ट को लेकर क्यों बना ‘रहस्य’?

निर्धारित तिथि पर हुई सुनवाई में मूल शिकायतकर्ता सेवानिवृत्त शिक्षक मासुरकर, संस्था के पदाधिकारी, बिंदुनामावली के अनुसार दावेदारी करने वाले शिक्षक सहित अन्य पक्षकार उपस्थित थे। सुनवाई के बाद शिक्षा उपसंचालक द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी थी, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि सुनवाई का निष्कर्ष क्या रहा।

शिकायतकर्ता द्वारा कई बार जानकारी मांगे जाने के बावजूद शिक्षा उपसंचालक कार्यालय की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया। हर बार कुछ दिनों में रिपोर्ट सामने आने की बात कहकर टालमटोल किया जा रहा है। अब शिक्षकों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि कहीं राजकीय या राजनीतिक दबाव के चलते शिक्षा उपसंचालक अपने ही आदेश को निरस्त करने की तैयारी तो नहीं कर रही हैं।

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