अर्बन नक्सलवाद (AI Generated Image)
Urban Naxalism in India: पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 1960 के दशक में एक विचारधारा के साथ शुरू हुआ माओवाद कई राज्यों के जंगल और दुर्गम इलाकों तक फैल गया। माओवाद के साथ सरकार की लड़ाई लंबी चली। ऐसा नहीं है कि पहली बार माओवाद को खत्म करने के लिए सरकार ने एक रणनीति के तहत काम किया। 70 के दशक की शुरुआत में ही बड़े कैडर को खत्म करने के लिए अभियान शुरू किए गए।
काफी हद तक इसमें सफलता भी मिली लेकिन सरकार वैचारिक लड़ाई को खत्म नहीं कर पाई। यही कारण था कि विचारधारा की इस लड़ाई में माओवादियों के ‘थिंक टैंक’ दोबारा सक्रिय हुए। पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में नक्सलियों की फौज खड़ी हो गई। एक तरफ जहां अन्य राज्यों में वैचारिक जंग लड़ी जा रही थी वहीं छग, आंध्र और महाराष्ट्र के जंगलों में 80 के दशक में पिपल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) अपना पैर पसार रहा था।
एक समय था जब जंगल में नक्सल पुलिस बल पर भारी पड़ रहे थे। उन्हें शहरों में बैठे अपने बुद्धिजीवियों का जबरदस्त सहयोग मिल रहा था। राज्य सरकार ने वर्ष 2005 में आत्मसमर्पण पॉलिसी शुरू की। इससे कई नक्सली लड़ाके प्रभावित भी हुए। चाहे जो कारण हो हथियारबंद नक्सलियों का आत्मसमर्पण शुरू हुआ लेकिन इसके साथ ही बड़े नक्सली अपना कैडर मजबूत करके सुरक्षा बलों को निशाना बना रहे थे। लेकिन वर्ष 2014 के बाद एक बार फिर सरकार ने नक्सल खात्मे का संकल्प लिया।
केंद्र और राज्य सरकारों ने विकास और बंदूक के बल पर मोर्चा खोल दिया। अब जंगल में माओवाद का खात्मा करने में सरकार को निश्चित ही सफलता मिली है लेकिन शहरी भागों में अब भी अर्बन नक्सलवाद (Urban Naxalism) तेजी से पैर पसार रहा है जिसे खत्म करना सरकार और प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर होगा। जानकारों का कहना है कि वैचारिक स्तर पर माओवाद से लड़ना सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
यह बात जग जाहिर है कि समूचे भारत में नक्सलवाद को मजबूत करने का काम माओवादियों के यूनाइटेड फ्रंट ने ही किया। 1980 से विभिन्न राज्यों के बड़े शहरों में बैठे नक्सल थिंक टैंक ने पीडब्ल्यूजी को मजबूत करने के लिए पर्दे के पीछे रहकर काम किया। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है ‘मिलिंद तेलतुंबड़े।’ मिलिंद महाराष्ट्र का सबसे बड़ा नक्सलवादी माना जाता था जो माओवादियों की केंद्रीय समिति का सदस्य था।
राजुरा में वेकोलि के यूनियन लीडर मिलिंद को शहरी भागों के अर्बन नक्सलियों ने ही बंदूक उठाने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 1998 के बाद से मिलिंद लगातार आत्मघाती हमलों में सक्रिय रहा और आखिर मर्दिन टोला में वह एनकाउंटर में मारा गया। शिक्षित होने के बावजूद यूनाइटेड फ्रंट ने उसका ऐसा ब्रेनवॉश किया कि वह अपना घर-परिवार छोड़कर जंगलों में जा बसा, इसीलिए भी शहरी नक्सलवाद पर लगाम कसना भी उतना ही जरूरी है।
244 पुलिस कर्मियों की शहादत
132 हथियारबंद नक्सलियों ने बीते वर्ष किया सरेंडर
805 सक्रिय नक्सलियों ने 21 वर्षों में किया आत्मसमर्पण
45 वर्षों तक चली जंगल की लड़ाई
609 नागरिकों को मारा गया
ऐसा नहीं है कि पुलिस विभाग ने अर्बन नक्सलवाद पर प्रहार नहीं किया। ऐसे कई नक्सली नेता रहे जो चोरी-छिपे जंगलों में मदद पहुंचा रहे थे। इनकी नीति समाज में अराजकता निर्माण कर सरकार और प्रशासन के खिलाफ लोगों को बरगलाने की रही है। इसके पूर्व बड़े विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों को नक्सल समर्थक होने के आरोप में पकड़ा जा चुका है।
यह दूसरी बात है कि उन पर आरोप सिद्ध करने में सरकार विफल रही हो लेकिन आज भी कई थिंक टैंक जेल में हैं। उनके समर्थन में काम करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। वकालात, लेखक, डॉक्टर और शिक्षा क्षेत्र में आइडियोलॉजी को फैलाने में आज भी काम चल रहा है।
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यहां तक कि पुलिस विभाग में भी विचारधारा से प्रभावित लोग देखने मिलते हैं। सबसे खूंखार नक्सली हिडमा के लिए जेएनयू के छात्रों का रास्ते पर उतरकर आंदोलन करना इसका सबसे ताजा उदाहरण है। जंगल के लिए तो सरकार ने अपनी नीति घोषित कर दी थी लेकिन अर्बन नक्सलवाद पर अब तक कोई ठोस योजना सामने नहीं आई है।
नक्सल विरोधी अभियान के विशेष आईजी संदीप पाटिल ने कहा कि सामूहिक प्रयासों से जंगल में नक्सलवाद को उखाड़ फेंकने में फोर्स को सफलता मिली है। ऐसा नहीं है कि शहरी भागों में रह रहे उनके कैडर पर विभाग की निगरानी नहीं है। पहले भी उन पर कार्रवाई की जा चुकी है। अर्बन नक्सल (Urban Naxalism) पर भी उचित कार्रवाई की जाएगी। सरकार और प्रशासन इस पर भी अपनी रणनीति तैयार कर रहा है।