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नवभारत विशेष: न्याय नहीं किया तो फिर जिंदा होगा नक्सलवाद, पुनर्निर्माण करना भी जरूरी
Naxal Insurgency End: सरकार ने नक्सलवाद पर बड़ी जीत का दावा किया है, लेकिन असली चुनौती अब आदिवासी क्षेत्रों में विकास, न्याय और विश्वास बहाली की है, क्योंकि विचारधारा अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
- Written By: अंकिता पटेल

Tribal Development Challenges( Source: Social Media )
Tribal Development Challenges: लंबे समय से चल रहे माओवादी उग्रवाद का खात्मा तकरीबन हो चुका है, लेकिन नक्सलवाद इससे पहले भी एक बार लुप्तप्राय, सुप्तप्राय होकर जिंदा हो चुका है। इसलिए असली लड़ाई इसके बाद की है।
आदिवासी क्षेत्रों के पुनर्निर्माण और न्याय तथा सम्मान की लड़ाई, यदि जंगल से माओवाद खत्म होने के बाद वहां केवल जेसीबी मशीनें ही दिखेंगी, तो फिर असंतोष पनप सकता है।
क्योंकि अभी भी नक्सल विचारधारा से सहानुभूति रखने वाले ग्रामीण और आदिवासी मौजूद हैं। नक्सलवाद खत्म हो जाएगा मगर विचारधारा जिंदा रहती है।
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30 मार्च 2026 को अमित शाह का यह दावा सही लगता है कि सरकार नक्सलवादियों के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल कर चुकी है। अब आधिकारिक तौर पर 50 से कम जबकि अनाधिकारिक तौर पर 130 से 150 नक्सलवादी और उनके दो बड़े कमांडर शेष हैं।
मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति अगर नेपाल फरार नहीं हुआ तो जल्द सरेंडर करेगा, फिर इस जंग में जीत की आधिकारिक घोषणा जायज होगी, 2010 के आसपास यह संघर्ष अपने चरम पर था, तब देश के एक-तिहाई जिलों में 20,000 नक्सली लड़ाके सक्रिय थे।
ऑपरेशन ग्रीन हंट के बावजूद उन्होंने दंतेवाड़ा में 76 जवान शहीद किए थे। 2017 में राजनाथ सिंह ने 6 सूत्रीय समाधान कार्यक्रम इनके सफाये के लिए बनाया पर स्थिति संभली नहीं।
पर उसके बाद 2019 से 2026 के बीच 7049 नक्सली गिरफ्तार किए गए और 5880 ने आत्म समर्पण किया, तेलंगाना-छत्तीसगढ़ सीमा पर 23 मई 2025 को ‘ऑपरेशन ब्लैक फरिस्ट’ के दौरान कई हार्डकोर नक्सलियों की मौत ने उनकी कमर तोड़ दी।
इसी साल कई कमांडरों के साथ 317 नक्सली मारे गए, 800 पकड़े और 2300 ने सरेंडर किया। सुरक्षा बलों ने 2024 के बाद से 748 गुरिल्लाओं को मारकर कीर्तिमान बनाया।
बीते महीने तक माओवादी गतिविधियों वाले जिलों की संख्या 800 से घटकर केवल 7 रह जाना इस सफलता का पुख्ता सबूत है। इस वर्ष के पहले तीन महीनों में ही तकरीबन 700 नक्सलवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का विकल्प चुना।
नक्सलियों का तरीका था स्वास्थ्य केंद्रों और सड़कों के निर्माण की सरकारी कोशिशों को रोकना, बच्चों को पांचवी से ज्यादा की शिक्षा से मना करना ताकि वे उनके पैदल सैनिक से ज्यादा कुछ न बन सकें।
संगठन में आए और शादी करो तो नसबंदी भी करवाओ, कंगारू अदालतों द्वारा असहमत को मौत जैसे नियमों ने उन्हें आदिवासियों के दिल से उतार दिया। उन्हें लगने लगा कि राजनेताओं और पुलिस को उड़ाने, खनन परियोजनाओं में तोड़फोड़, मोबाइल फोन टावरों को आग लगाने के पीछे उनके निहित स्वार्थ हैं।
माओवादियों से आदिवासियों के बढ़ते मोहभंग के बीच सरकार ने पिछड़े जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बैंकिंग और मोबाइल कनेक्टिविटी मिशन चलाया। सख्ती बढ़ाने के साथ नक्सलियों के लिए सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी, नकद प्रोत्साहन का लालच, नौकरी, कौशल प्रशिक्षण की बात की तो हजारों नक्सलियों ने मान लिया कि हथियारबंद लड़ाई का समय गया और हथियार डाल आत्मसमर्पण किया।
एक विशेष दल गठित कर माओवादियों के जरिए ही या तो उन्हें समर्पण कराया गया अथवा निशाना बनाया गया। आदिवासियों को अधिकार और रोजगार भी दिए गए ताकि वे वापस नक्सलवाद की ओर न मुड़ें।
शीर्ष नेतृत्व और कैडर का खत्म होने, वित्तीय स्रोतों पर नियंत्रण और स्थानीय समर्थन में गिरावट से हिंसक घटनाओं में 70 से 80 फीसदी तक कमी आई और नक्सल प्रभावित जिले 200 से घटकर 40 रह गए,
पुनर्निर्माण करना भी जरूरी
अर्बन नेटवर्क से मिलने वाले वैचारिक समर्थन तोड़ देने के बाद नक्सलवाद ‘राष्ट्रीय खतरे’ से घटकर ‘क्षेत्रीय चुनौती’ भी नहीं बचा। देश के लगभग 40 प्रतिशत खनिज भंडार आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्थित हैं और स्वतंत्रता के बाद विकास परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों लोगों के विस्थापन का इतिहास भी हमारे सामने है, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासियों की ही है।
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नक्सलवाद के खात्मे के बाद इन क्षेत्रों में केवल सड़कें, खदानें और उद्योग ही दिखाई दें और सामाजिक न्याय, स्थानीय भागीदारी न आए, तो इस शांति के स्थायित्व पर शंका बनी रहेगी।
लेख-संजय श्रीवास्तव के द्वारा
Maoism decline india post conflict challenges tribal development
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