मेट्रो सिटी में 90 के दशक वाला ढर्रा, 20 लाख गाड़ियों के बीच नागपुर का ट्रैफिक सिस्टम वेंटिलेटर पर

Nagpur Traffic Management: नागपुर में 30 वर्षों में वाहन 20 लाख के पार पहुंचे, लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था पुराने ढर्रे पर है। एआई सिग्नल और आधुनिक तकनीकों के अभाव में शहरवासी रोजाना जाम से जूझ रहे हैं।
Nagpur Smart City Traffic
सिटी ट्रैफिक पुलिसप्रतीकात्मक तस्वीर, सोर्स- AI
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Nagpur Smart City Traffic: मेट्रो सिटी की ओर बढ़ रहे नागपुर शहर का ट्रैफिक मैनेजमेंट आज भी 90 के दशक वाले ढरें पर खड़ा है। 30 वर्ष पहले भी बड़ीं, वैरायटी चौक, इतवारी, महल, अग्रसेन चौक और कॉटन मार्केट जैसे सभी प्रमुख चौराहों में खराब इंफ्रा, घिसे-पिटे नियमों और खराब सेंस के कारण ट्रैफिक सिस्टम गर्त में नजर आता था। आज भी नजर आ रहा है।

घिसे-पिटे हथियारों से लड़ी जा रही जंग

नागपुर सुधार न्यास, महापालिका और सिटी ट्रैफिक पुलिस के पास इस ढहती व्यवस्था को संभालने के नाम पर आज भी वही घिसे-पिटे हथियार हैं: एक लाल-हरा सिग्नल, सड़क पर आधी मिटी जेबरा क्रॉसिंग और चौराहे पर चालान की रसीद काटते सफेद शर्ट वाले पुलिसकर्मी।

इन 3 दशकों में शहर की आबादी दोगुनी से ज्यादा हो गई, वाहनों का हुजूम 20 लाख के पार पहुंच गया, लेकिन व्यवस्था में 'नवाचार' (इनोवेशन) अब भी गायब है। विकास और आधुनिकता के नाम पर मिला तो 'सीमेंट का जंगल' और मेट्रो के खंभे, जिन्होंने फ्लाईओवर बनने के बावजूद बची-खुची सड़कों को और संकरा बना दिया।

दूसरी ओर, नागपुर जिले में जब भी कोई नया अधिकारी आता है तो वही पुराने पैंतरे दोहराए जाते हैं, किसी चौक पर बैरिकेड ठोंक देना, किसी कट-आउट को सीमेंट से बंद कर देना, स्पीड ब्रेकर लगा देना। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत चौराहों पर कैमरे तो लगे, लेकिन उनका उद्देश्य ट्रैफिक सुचारु करना कम और चालान की पर्ची काटकर राजस्व जुटाना ज्यादा बन गया। देखने वाली बात यह है कि सिटी की यह व्यवस्था आखिर कब बदलेगी।

वर्ल्ड इनोवेशन : कब बनेगी दूरगामी सोच

  • यदि दुनिया के उन व्यस्त शहरों पर नजर डालें तो समझ आयेगा कि हम कितने पीछे हैं। आज दुनिया के कई शहरों ने ट्रैफिक जाम की चुनौती को तकनीक और दूरगामी सोच से मात दी है।

  • टोक्यो का AI-एडाप्टिव सिग्नलिंग जापान के टोक्यो शहर में एआई कैमरे और सेसर्स गाड़ियों की संख्या देखकर रियल-टाइम में सिग्नल का हरा समय तय करते हैं।

    हालांकि कुछ महीनों पहले शहर के करीब 20 चौराहों के सिग्नल एआई आधारित किये गये हैं लेकिन इन्हें नवाचार नहीं कहा जा सकता। आज भी शहर के 99 प्रतिशत सिग्नलों पर लोग 120 सेकंड तक रेड लाइट देखकर माथा पटकते हैं।

  • सिंगापुर का ERP सिस्टम सिंगापुर ने 'इलेक्ट्रॉनिक रोड प्राइजिंग' लागू कर पीक आवर्स में भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने वाले वाहनों पर डिजिटल फीस लगाई, जिससे सड़कों पर गैर-जरूरी ट्रैफिक अपने आप ही घट गया।

  • बार्सिलोना के सुपरब्लॉक्स स्पेन में रिहायशी इलाकों के अंदर भारी वाहनों की एंट्री बैन कर अंदर का इलाका पूरी तरह पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के लिए सुरक्षित कर दिया गया।

  • बाइक बॉक्स या 'एडवांस्ड स्टॉप लाइन ( एएसएल): यह व्यवस्था मुख्य रूप से ब्रिटेन, डेनमार्क, नीदरलैंड, स्वीडन, ताइवान और अमेरिका के कई शहरों में बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है।

  • सिग्नल पर जेब्रा क्रॉसिंग के बाद एक बॉक्स बना होता है जिसमें केवल साइकिल चालक और बाइक सवार ही खड़े होते हैं। इससे कारों या बड़े वाहनों के बीच दोपहिया वाहन नहीं फंसते और चालक की सुरक्षा पुख्ता होती है।

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कागजी बैठकों से आगे बढ़ना होगा

नागपुर शहर के ट्रैफिक सिस्टम को ढहने से बचाने के लिए अब कुछ कठोर और आधुनिक कदम उठाने होंगे, समय आ गया है कि कागजों पर 'स्मार्ट' दिख रहे नागपुर को जमीन पर भी 21वीं सदी का आधुनिक ट्रैफिक सिस्टम दिया जाए।

डायनामिक और स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल स्थिर टामइर वाले सिग्नलों को हटाकर एआई-आधारित ट्रैफिक एडाप्टिव कंट्रोल सिस्टम (एटीसीएस) तत्काल लागू किया जाए।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का पुनरुद्धार केवल मेट्रो बनाने से बात नहीं बनेगी, अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी के लिए फीडर बसे और समर्पित साइकिल ट्रैक बनाने होंगे, ताकि निजी वाहनों की संख्या कम हो सके।

सख्त पार्किंग नीति व अतिक्रमण से मुक्ति मुख्य व्यावसायिक क्षेत्रों में पे-एंड-पार्क और मल्टी-लेवल पार्किंग को कड़ाई से लागू करना होगा, सड़कों और फुटपाथों से अतिक्रमण हटाए बिना कोई भी मॉडल सफल नहीं हो सकता।

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रविन्द्र कासखेड़ीकर ने कहा कि सुधार की मानसिकता ही नहीं

ट्रैफिक नियमों पर जागरूकता फैलाने वाली सामाजिक संस्था 'जन आक्रोश' के सचिव व मुख्य संचालक रविन्द्र कासखेड़ीकर ने कहा कि वास्तव में हमारे यहां ट्रैफिक सिस्टम में सुधार की मानसिकता ही नहीं है।

सीसीटीवी कैमरों से नजर रखने के दावे के बाद आज हजारों करोड़ के चालान पेंडिंग हैं तो फिर कौन सुधरेगा। वास्तव में इस सेक्टर में हम न्यू टेक्नोलॉजी और आइडियाज को अपनाना ही नहीं चाहते।

पहले देश की पासपोर्ट सर्विस सबसे घटिया मानी जाती थी लेकिन टाटा कंपनी को जिम्मेदारी सौंपते ही नजारा बदल गया। मेरा मानना है कि ऐसा ही प्रयोग ट्रैफिक सिस्टम में सुधार के लिए भी किया जाना चाहिए।

सतीश दंडारे नवभारत।

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