
नागपुर. सिटी में आज सैकड़ों की संख्या में हॉस्पिटल हैं. पुराने से लेकर नए तक हैं. नए में फायर फाइटिंग सिस्टम लगे हैं, जबकि पुराने वालों में लगवाया गया है. परंतु इन सिस्टमों की देखरेख हो रही है या नहीं यह देखने वाला कोई नहीं है. हालांकि इनके ऊपर बंधन है कि 6 माह में ऑडिट हो और उसकी जानकारी फायर विभाग को दी जाए, परंतु दु:खद बात यह है कि 10 से 15 फीसदी संचालक ही रिपोर्ट देने की पहल करते हैं, जबकि 85 फीसदी संचालक गायब हो जाते हैं. जब घटना और दुर्घटना होती है तो रिपोर्ट देने न देने की बात सामने आती है. भंडारा कांड ने पुन: एकबार सभी को सोचने के लिए मजबूर कर दिया है.
सूत्र कहते हैं कि निजी और सरकारी दोनों को ही फायर फाइटिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य है. जहां नहीं है वहां पर लगाने की पहल की जाती है. लोग एक बार खर्च कर सिस्टम लगवा भी लेते हैं, इसके बाद कोई देखने वाला नहीं रहता है कि सिस्टम चालू स्थिति में है या नहीं. इसके लिए थर्ड पार्टी ऑडिट करने की व्यवस्था है. सिटी में सरकारी मान्यता प्राप्त कम से कम 30-32 एजेंसियां हैं जो ऑडिट का काम करती हैं. इन एजेंसियों के द्वारा बी-फार्म दिया जाता है और फिर इस फार्म को फायर ऑफिस में जमा कराना पड़ता है परंतु इस प्रक्रिया पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. फायर ऑफिसर अपने स्तर पर सर्वे करते हैं. महीने में 80-90 प्रतिष्ठानों की जांच होती रहती है और उन्हें सुझाव दिया जाता है. इसके बावजूद संचालकों को जागृत होने की जरूरत है.
सूत्रों के अनुसार नागपुर के दोनों अस्पताल मेयो और मेडिकल सेफ हैं. दोनों आकार में काफी बड़े हैं और निर्माण ज्यादा नहीं है. वेंटिलेशन की सुविधा काफी ज्यादा है. इसलिए फायर की स्थिति में यहां पर खतरा होने की संभावना काफी कम है. यहां पर समस्या यह है कि संचालन आरोग्य विभाग करता है और रखरखाव की जिम्मेदारी पीडब्ल्यूडी विभाग की है. आपसी तालमेल के अभाव में दिक्कतें सामने आती है.
फायर आफिसर्सों का कहना है कि निजी अस्पताल में फोकस करने की निश्चित रूप से जरूरत है, क्योंकि कई अस्पतालों के नीचे रेस्टोरेंट और होटल हैं, तो कई तंग गलियों में है. इतना ही नहीं कई अस्पताल तो आवासीय फ्लैट स्कीम में चल रहे हैं. उपकरण लगा दिए गए हैं. लेकिन ऐसे अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग काफी जरूरी है. एजेंसियों को ऑडिट करना ही चाहिए और फिर रिपोर्ट देनी चाहिए. 6 माह में एक बार रिपोर्ट देने में हर्ज भी नहीं है लेकिन संचालक इतना भी जहमत नहीं उठाते.
99 फीसदी घटनाओं में पता चलता है कि बिजली की शार्ट सर्किट के कारण आग लगी है. ऐसे में इलेक्ट्रिकल ऑडिट के लिए कठोर नियम बनाने की जरूरत है. इतना ही नहीं इसके लिए नियम भी कड़े होने चाहिए. अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से 90 फीसदी आगजनी पर अंकुश लगाया जा सकता है. आज इलेक्ट्रिकल ऑडिट होता है या नहीं इसका पता ही नहीं चलता. कौन करता है यह भी किसी को पता नहीं. ऐसे में इस सेक्टर को बंधनकारक करना सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है.
स्कूल की दशा तो और भी दयनीय है.अधिकांश स्कूल में जबरन सिस्टम लगवाए जा रहे हैं. लेकिन संचालकों को इसकी परवाह नहीं है. स्कूल सेक्टर के लिए एक बार गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. यहां पर भी सैकड़ों की संख्या में छात्र रहते हैं. इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है. सीबीएसई स्कूल में नियमों का पालन एक पैमाने तक हो रहा है, लेकिन अन्य स्थानों पर जोर लगाने की सख्त जरूरत है.
जहां पर नवजात शिशु रखने की व्यवस्था है या फिर आईसीयू या ऑपरेशन थिएटर, ऐसे स्थानों पर डबल फोकस करने की जरूरत है, क्योंकि मरीज खुद चलकर बाहर नहीं निकल सकते. इसलिए संचालकों की जिम्मेदारी है कि डबल सेफ्टी मेजर्स अपनाये. इतना ही नहीं इलेक्ट्रिकल सेफ्टी पर सबसे ज्यादा फोकस होना चाहिए. आईएसआई मार्क वाले गुणवत्तापूर्ण उत्पाद ही लगाए जाने चाहिए. ट्रेंड इलेक्ट्रिशियन से काम कराना चाहिए. हर उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर रहे तो समस्याएं कम होगी, परंतु खर्च बचाने के चक्कर में लोग जीवन को जोखिम में डाल रहे हैं. आग न लगे ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि परिवार और लोगों को सुरक्षित रखा जा सके.
-राजेंद्र उचके, मुख्य फायर ऑफिसर






