नागपुर APMC को ‘राष्ट्रीय दर्जा’ देने पर सुनील केदार भड़के; सरकार पर लगाया भेदभाव और राजनीतिक पक्षपात का आरोप
Nagpur APMC News: पूर्व मंत्री सुनील केदार ने नागपुर एपीएमसी को राष्ट्रीय बाजार समिति का दर्जा देने के फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने इसे राजनीतिक और भेदभावपूर्ण निर्णय बताया।
- Written By: अंकिता पटेल
सुनील केदार, नागपुर एपीएमसी, (सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur National Market Committee: नागपुर पूर्व मंत्री सुनील केदार ने राज्य सरकार द्वारा हाल ही में नागपुर कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) को राष्ट्रीय बाजार समिति का दर्जा देने के फैसले पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे पूरी तरह से राजनीतिक और पक्षपातपूर्ण बताया। शनिवार को आयोजित पत्र परिषद में केदार ने सरकार पर चुनिंदा और भेदभावपूर्ण नीति अपनाने का सीधा आरोप लगाया।
मंत्री सुनील केदार ने कहा कि राष्ट्रीय बाजार समिति के गठन के लिए सरकार ने जो नियम और मानक तय किए थे, उसमें राज्य की करीब 6 मंडियां पूरी तरह फिट बैठ रही थीं लेकिन सरकार ने सभी पर विचार करने के बजाय सिर्फ अपनी राजनीतिक सहूलियत के लिए मुंबई और नागपुर एपीएमसी को ही चुना, जो साफ तौर पर उनके राजनीतिक एजेंडे को दिखाता है।
नागपुर (कलमना) बाजार के गौरवशाली और आत्मनिर्भर इतिहास का जिक्र करते हुए पूर्व मंत्री केदार ने बताया कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नाम पर स्थापित इस मंडी ने बिना किसी सरकारी मदद के यह मुकाम हासिल किया है। केदार ने कहा कि शुरुआत में कामठी, नागपुर और हिंगना तहसीलों के लिए बनी इस मंडी का बाद में राजनीतिक दुर्भावना से विभाजन भी किया गया। इसके बावजूद कलमना मंडी ने अपनी तरक्की की रफ्तार कम नहीं होने दी।
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सरकार से एक रुपया या एक इंच जमीन लिए बिना मंडी ने अपने खुद के आर्थिक बूते पर 150 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया और आज वहां एक बेहद आधुनिक और मजबूत बाजार खड़ा है। इस परिसर में कोल्ड स्टोरेज, बैंक, किसानों के रहने और खाने-पीने की बेहतरीन सुविधाएं मौजूद हैं। यहां तक कि नगर निगम पर निर्भर न रहकर मंडी ने 7 किलोमीटर दूर से अपनी खुद की पाइपलाइन बिछाकर पानी की स्वतंत्र व्यवस्था की है। आज कलमना मंडी (एपीएमसी) के पास करीब 150 करोड़ रुपये की एफडी भी है।
केदार ने कहा कि इस मंडी की बेहतर व्यवस्था के कारण ही आज नागपुर और आसपास के इलाके में बिकने वाली करीब 80 फीसदी सब्जियां मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और नाशिक से आती हैं। बाहर के किसानों को यहां अपने माल का स्थानीय बाजारों से ज्यादा दाम मिलता है। इसीलिए वे इतना लंबा सफर तय करके यहां आते हैं। कोरोना के उस भयावह दौर में जब सब कुछ पूरी तरह बंद था, तब भी कलमना मंडी ने बिना रुके नागपुर शहर के लोगों तक ताजा फल और सब्जियां पहुंचाई थी।
बाजार समिति के चुनाव ईवीएम से नहीं बैलेट पेपर से होते हैं
सुनील केदार ने चेतावनी दी कि नए कानून के लागू होने के बाद मंडियों में लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह खत्म हो जाएगी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, बाजार समिति के चुनाव ईवीएम से नहीं बल्कि बैलेट पेपर से होते हैं और बैलेट पर ठप्पा मारने की बात आते ही किसे डर लगता है, यह बताने की जरूरत नहीं है। इस नए कानून से मंडियों में चुनाव की प्रक्रिया हमेशा के लिए बंद हो जाएगी और किसानों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों का अस्तित्व खत्म कर पूरी कमान सरकारी अधिकारियों और मनोनीत सदस्यों के हाथों में सौंप दी जाएगी।
जरूरत पड़ी तो सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे
पूर्व मंत्री ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि अगर सरकार को वाकई किसानों की इतनी ही चिंता है, तो वे सहकारिता के माध्यम से खड़ी की गई इन संस्थाओं को हड़पने के बजाय खुद की अलग व्यवस्था खड़ी करें और हमसे मुकाबला करें। उन्होंने साफ किया कि यह कोई साधारण राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि किसानों के हक और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाने की एक बड़ी सामाजिक लड़ाई है।
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यह मंडी किसी को तोहफे में नहीं मिली है, बल्कि इस जिले के मेहनतकश किसानों के पसीने की गाढ़ी कमाई और उनके स्वाभिमान से खड़ी हुई है। इसलिए इस स्वायत्त व्यवस्था को किसी भी कीमत पर बिखरने नहीं दिया जाएगा। इस फैसले के खिलाफ वे अदालत में कानूनी लड़ाई तो लड़ेंगे ही, जरूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरकर एक बड़ा आंदोलन भी करेंगे।
