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नागपुर में सीमेंट सड़कों पर भी गड्ढे, उखड़े ज्वाइंट और असमतल सतह की समस्या सामने आने का दावा।
रामेश्वरी-मनीषनगर मार्ग पर मैनहोल के ढक्कनों और सड़क के लेवल में अंतर होने की बात कही गई है।
हिंगना टी-पॉइंट से पारडी चौक तक सड़क की गुणवत्ता और रखरखाव पर सवाल उठाए गए हैं।
दिघोरी चौक से छत्रपति चौक तक रिंग रोड पर पाइपलाइन और ओवरब्रिज निर्माण के बाद सड़क की स्थिति बिगड़ने का उल्लेख है।
Nagpur Smart City Roads Potholes: नागपुर में कभी डामर की सड़कों के गड्ढे नागपुर की पहचान बन गए थे। उम्मीद थी कि 350 किमी से अधिक सड़कों का सीमेंटीकरण इस बदनामी से शहर को मुक्ति दिलाएगा। स्मार्ट प्रोजेक्ट के तहत दावा था- सड़कें मजबूत होंगी, गड्डों से छुटकारा मिलेगा।
वाहन सुरक्षित चलेंगे और बार-बार होने बाला मेंटेनेंस कम होगा। लेकिन शहर की सड़कों को देखकर लगता है कि गड्डों ने सिर्फ अपना ठिकाना बदला है। डामर से निकलकर अब सीमेंट पर आ गए हैं। कहीं ज्वाइंट खुला है, कहीं गट्ट उखड़ा है, कहीं मैनहोल का ढक्कन सड़क से ऊपर है तो कहीं सड़क की सतह ही हिचकोले खिलाने लगी है।
सीमेंटेड रोड का सबसे बड़ा फायदा उसकी समतल और टिकाऊ सतह माना जाता है लेकिन कई हिस्सों में यही मूल उद्देश्य गायब दिखाई देता है। सड़क पर चलते वाहन को अचानक दवका लगना अब सामान्य बात होती जा रही है। खासकर दोपहिया वाहन चालकों के लिए सड़क की छोटी-सी खामी भीबड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
सड़कों के ज्वाइंट पर लगाए गए गड्डुओं के उखड़ने और ज्वाइंट खुलने की समस्या ज्यादा खतरनाक है। दोपहिया वाहन का पहिया जरा-सा भी इसमें फंसा तो चालक का संतुलन बिगड़ जाता है।
डामर की सड़क पर जहां ऐसी स्थिति मामूली खरोंच तक सीमित रहती वहीं तेज रफ्तार दोपहिया वाहन सीमेंटेड सड़क पर पलटने पर चालक को गंभीर चोट लगती है। सिर पर चोट, शरीर पर लंबा घिसाव और वाहन को नुकसान- खामी छोटी, परिणाम बड़ा।
रामेश्वरी से मनीषनगर तक सीमेंटेड सड़क इसकी एक झलक दिखाती है। वाहन चालक को कई जगह यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि गाड़ी सड़क पर चल रही है या किसी हिचकोला ट्रैक पर। मेनहोल के ढक्कन सड़क की सतह के अनुरूप नहीं हैं। कहीं
ढक्कन उभरा हुआ तो कहीं आसपास की सतह धंसी हुई। खास बात है कि अभी इस सड़क को पूरा करके शुरू करने में एक वर्ष का समय भी नहीं हुआ है।
स्मार्ट सिटी का मतलब केवल सीमेंट की सड़कें बिछाना नहीं बल्कि ऐसी सड़कें देना है जिन पर नागरिक सुरक्षित और सुगम तरीके से सफर कर सकें।
सीमेंट की सड़क बनाना गलत नहीं है। असली सवाल निर्माण की गुणवत्ता, इंजीनियरिंग, सुपरविजन और रखरखाव का है।
सड़क बनने के बाद यदि ज्वाइंट खुल रहे हैं, गडू उखड़ रहे हैं और मेनहोल सड़क की सतह से मेल नहीं खा रहे हैं तो केवल नई सड़क बना देना पर्याप्त नहीं है।
आखिर सवाल सिर्फ सड़क के खराब होने का नहीं है। सवाल यह है कि जिस खामी पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सुधार नहीं हुआ, उसकी कीमत अगला दोपहिया चालक अपनी हड्डियों से क्यों चुकाए?
हिंगना टी-पॉइंट से पारडी चौक तक का हिस्सा भी सड़क निर्माण की गुणवत्ता और रखरखाव को बखिया उधेड़ने के लिए काफी है। ज्वाइंट, लेवलिंग और निर्माण के बाद की स्थिति कई जगह ऐसी है कि वाहन चालक को लगातार सतर्क रहना पड़ता है।
जिस सीमेंटेड सड़क को सुविधा और सुरक्षा का पर्याय बनाया गया था वही सड़क कई जगह अतिरिक्त सावधानी की मांग कर रही है।
नागपुर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में बनी सीमेंट की सड़कों के हाल ये भी हैं कि कई जगह खराब निर्माण की जगह या तो बड़े-बड़े गड्ढे हो गये हैं गा फिर सड़क ही धंस गई है।
खास बात है कि शहर में कई जगहों पर सीमेंट की सड़कों पर बने हुए इन बदसूरत गड्डों को छुपाने के लिए डामर का इस्तेमाल किया जा रहा है। डामर की परत भी कुछ दिनों में ही गड्डों भरी कालीन के सामान हो जाती है। नतीजा, वाहन चालकों को भुगतना पड़ता है।
दिघोरी चौक से छत्रपति चौक तक सीमेटेड रिंग रोड की कहानी भी कम परेशान करने वाली नहीं है। पहले पाइपलाइन के लिए सड़क खोदी गई।
इसके बाद ओवरब्रिज निर्माण ने स्थिति और बिगाड़ दी। मानेवाड़ा चौक से 100 मीटर दूर से शुरू हुए गड्ढे हुड्केश्वर चौक तक वाहन चालक का साथ नहीं छोडते।
ये नजारा बिल्कुल फेवीकोल के जोड़ सरीखा नजर आता है। ऐसे बड़े निर्माण कार्य के दौरान सड़के खराब होना और यातायात प्रभावित होना स्वाभाविक है।
नागरिकों को सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि स्थानीय प्रशासन ही जनता को भगवान भरोसे छोड़ दे तो फिर भगवान ही मालिक है।